गाय तू चली जा यहां से।

सुन लो इस गाय की कथा

समझ सको तो समझो इसकी व्यथा

मत आना इस लोक

यहां मिलता केवल शोक

तुम्हे अब रहे सब निहार

पहले करती थी स्वच्छंद विहार

चली यदि तुम किसी के खेत

और उसने लिया तुमको देख

लाठी तक बरसेगी

घास को तू तरसेगी

लाठी का तू देख कमाल

चमड़ी को यह कर देगा लाल

पीड़ा यह ऐसा करते

क्या हम उनको सह सकते हैं

पढ़ी मैंने प्रेमचंद की गोदान

गाय रखने को तब होता अभिमान

कैसी आ गई है परिस्थिति

गायों की बदल चुकी है स्थिति

नहीं दिखता कोई आहार

प्लास्टिक खाने को है लाचार

खेत के चारों ओर दिखते तार

चारा खाने का यह करते विचार

पेट भरने की इनकी चाहत

कटीले तार कर देते आहत

ऐसे एक गाय को मैंने देखा

तारों ने चमड़ी पर खींची लाल रेखा

कातर दृष्टि से देखती सबको

आंखों में दुख का सागर दिखता मुझको

इधर से मारे जाते

फिर लौट कर आते

दिखता यह व्यवधान

नहीं निकलता कोई समाधान

खो चुकी है यह अपनी ताकत

लाठियां करती इनका स्वागत

हो चुके हैं आवारा

नहीं दिखता कोई सहारा

लग गई है कैसी हाय

मुफ्त में दे रहे सब अपनी गाय

मासूम बछड़े बनते लाठियों का शिकार

हृदय से उनके निकल पड़ती है चित्कार।।।

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