थूकिस्तान मत बनाओ हिन्दुस्तान को!!!

रेलवे क्रॉसिंग बंद होने के कारण जब मेरा सुपर स्प्लेंडर रुका तो सड़क पर पैर रखने का साहस नहीं हुआ। शहर के सभ्य लोगों ने मुंह से ना जाने क्या-क्या उगल कर सड़क पर छोड़ दिया था की घृणा सी हो रही थी। पान की पीक यत्र तत्र फैली हुई थी।ऑटो से रुकने वाले यात्री और चालक सड़क की सुंदरता को और भी बढ़ा दे रहे थे।लगता था कि क्रॉसिंग पर रुकने के बाद ही उन्हें थूकने का मौका मिलता है अन्य जगह उनके लिए नहीं बची हुई है।वे इतनी निर्लज्जता से स्वच्छता की परवाह किए बिना सड़क पर थूक रहे थे मानो वे भारत को दुनिया के सबसे गंदे देशों की श्रेणी में लाना चाहते हो। कोई खैनी की पिक से सड़क की सुंदरता को विकृत करता तो कोई रक्त वर्ण पान की पीक से सड़क की सुंदरता में चार चांद लगा देता।कुछ लोग ऐसे थे जो न पान खा रहे थे ना खैनी लेकिन उन्हें भी लग रहा था कि यह थूकने का उत्तम स्थान है। अतः सड़क की सुंदरता को बढ़ाने में हमारा भी योगदान होना चाहिए। इसलिए खखार कर पूरे जोर से थूक का उत्सर्जन कर रहे थे ।जिनका मुंह अभी खाली था वह भी थूकने के लिए अपने मुंह को पान और गुटको से भर रहे थे।बड़े ही रोमांचक तरीके से फिल्मी स्टाइल में छोटे से गुटके का पैकेट फाड़कर मसाला मुंह में रखते और उस पैकेट को उछाल कर फेंक देते जो थोड़ी दूर हवा में जाता और फिर सड़क पर आ जाता। यह सत्य है कि क्रॉसिंग के पास सड़क आपको जितनी गंदी मिलेगी वैसी कहीं और नहीं मिलेगी या मिलेगी तो कम ही मिलेगी।एक बात स्पष्ट है कि लोगों को अच्छी तरीके से पता चल गया है कि गंदगी करने के लिए यह उत्तम स्थान है क्योंकि उनको यहां पर थोड़ा आराम मिलता है। तो जनाब गंदगी से यह हाल हो रहा था, इतनी घृणा हो रही थी कि यदि 5 मिनट के अंदर ट्रेन ना गुजरे और क्रासिंग ना खुले तो व्यक्ति वही ट्रैक पर आत्महत्या कर ले।

प्रतिदिन घर से विद्यालय और विद्यालय से घर आते समय कज्जाकपुरा रेलवे क्रासिंग पर इस गंदी परिस्थिति से सामना होता है। सौभाग्य से कभी-कभी क्रॉसिंग खुला मिलता है तो इस घुटन से थोड़ी राहत महसूस होती है। हो सकता है कि इस लेख को पढ़कर कोई कहे कि भैया आप कहां थूकते हैं क्या आप इतने सचेत हैं।तो भैया हां मैं सफाई को लेकर अत्यंत सचेत हूं अन्यथा इतनी बारीकियों से आपके व्यवहार का निरीक्षण करना किसी सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं। मैं पान गुटका नहीं खाता अतः मेरी तरफ से इस बात की संभावना बहुत कम हो जाती है।सड़क के किनारे जहां घास और गंदगी हो वहां पर थूक लेना कुछ हद तक उचित माना जा सकता है लेकिन इस तरह निर्लोज्जो की तरह सड़क के बीचो-बीच गंदगी फैलाना कतई क्षम्य नहीं है। राज्य सरकार के सरकारी कार्यालयों की स्थिति और दयनीय दिखाई पड़ती है। वहां के कर्मचारी सिढ़ी के पास चैनल के कोने में थूक कर ऐसी लालिमा फैला देते हैं कि उस दृश्य के बारे में क्या कहा जाए।

सड़क पर वाहन चलाते हुए यदि आप सचेत नहीं रहते हैं तो हो सकता है कि स्कॉर्पियो या बोलेरो से निकली हुई पान की पीक आपके वस्त्रों को मलिन कर दे।अधिकांश मंहगे वाहनों में बैठे हुए लोग अपनी सभ्यता का परिचय इसी प्रकार से देते हैं।कार के अंदर बैठा हुआ सभ्य व्यक्ति केला खाकर छिलका बाइक चलाने वाले को भेंट कर सकता है इसकी पूरी संभावना बनी रहती है। ऐसे लोगों को स्वच्छता और साफ-सफाई से कोई मतलब नहीं रहता है।सामान्य रूप से हम कहते हैं कि साफ-सफाई हर व्यक्ति को अच्छी लगती है, लेकिन यह बात गलत है यदि सबको साफ सफाई अच्छी लगती तो वे अपने आसपास के स्थान को साफ स्वच्छ रखने में सहयोग देते। लेकिन इन लोगों को लगता है गंदगी प्रिय है इसलिए यह अपने व्यवहार पर तनिक भी ध्यान नहीं देते हैं कि इनके इस कृत्य से कितनी बड़ी समस्या उत्पन्न हो रही है। अपने छोटे-छोटे इन कृत्यों से हम बहुत बड़ी बड़ी समस्या उत्पन्न कर रहे हैं। आशापुर चौराहे पर चाट खाते हुए एक व्यक्ति मुझसे बोला कि यदि सब लोग सचेत हो जाएं तो ऐसी समस्याओं को समाप्त किया जा सकता है लेकिन उसने बाद में यह भी बोला कि वह खुद नहीं सुधरेगा।सबसे बड़ी बात है कि हम दूसरों को तो सुधारना चाहते हैं लेकिन स्वयं नहीं सुधारना चाहते हैं। जो लोग कहते हैं कि बनारस कभी नहीं सुधरेगा वह लोग ऐसे थूकेरों में पहले स्थान पर आते हैं।जो लोग सभ्य होते हैं वह अपना कार्य करते रहते हैं और इस प्रकार की नकारात्मक बातें कभी नहीं करते हैं। इस तथ्य पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि एक से एक बड़े बड़े विश्वविद्यालयों से पढ़े हुए तथाकथित बुद्धिजीवी लोग भी ऐसे विषयों पर अनपढ़ो जैसा व्यवहार करते हैं तब स्थिति और सोचनीय हो जाती है। व्यक्ति नौकरी और व्यापार में सफल होने के लिए बहुत प्रयास करता है किंतु स्वच्छता जैसे महत्वपूर्ण विषय पर तनिक भी विचार नहीं करता है। बनारस में पान प्रतिबंधित हो जाए तो सड़कों को कुछ राहत मिल सकती है लेकिन यह असंभव है।

सुधार की संभावना क्या है???

ऊपर की पंक्तियों में समस्याओं पर तो हमने बहुत बात कि अब देखते हैं कि सुधार की कितनी संभावना है। सुधार के दो तरीके दिखाई पड़ते हैं, प्रथम है कि व्यक्ति स्वयं सचेत होवे और थोड़ा जागरूक बने अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएं। दूसरा है कि कड़े से कड़े नियम लगाया जाए और ऐसे लोगों को दंडित किया जाए।

सुधार का जो पहला तरीका है उसमें सफलता की संभावना कम है। यदि लोग इतना सचेत हो सकते तो स्थिति इतनी विकट ना होती। लोग कहते हैं शिक्षा से कुछ सफलता मिल सकती हैं। लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि शिक्षा से स्वार्थ ज्यादा सुधार कम आता है।वाराणसी जनपद की शिक्षा व्यवस्था अच्छी है लेकिन गंदगी का क्या स्तर है यह आप भली-भांति समझ सकते हैं।बड़े-बड़े पब्लिक स्कूलों में पढ़ने और पढ़ाने वाले भी अपने व्यवहार से हमें यह बता देते हैं कि उनमें सफाई को लेकर समझ कितनी कम है। दुनिया में हर आदमी सचेत है लेकिन केवल अपने स्वार्थों के लिए सुधार के लिए नहीं।जहां सब की बात आती है हम वहां से मुंह फेर लेते हैं लेकिन हमें यह बात ध्यान देना चाहिए कि उन सब में हम भी शामिल होते हैं। सड़क साफ होगा तो सबके लिए अच्छा होगा किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं। हम सफाई चाहते हैं लेकिन सफाई में योगदान देना नहीं चाहते हैं।बात यह नहीं है कि समस्या बड़ी है मुख्य बात यह है कि हम अपना थोड़ा सा भी योगदान देना नहीं चाहते हैं।हमें सफाई करने के लिए कोई नहीं कह रहा है बस कहा यह जा रहा है कि गंदगी ना फैलाएं। हमें हिंदुस्तान को थूकिस्तान बनने से रोकना होगा। नकारात्मकता को त्याग कर थोड़ा सा सचेत होवें और परिणाम आपके सामने होगा। मुझे पूरा विश्वास है कि हम ऐसा कर सकते हैं।हमें दूसरों की परवाह किए बिना अपना कार्य करना चाहिए यदि हम ईमानदारी से अपना कार्य करेंगे तो हो सकता है दूसरे लोग भी हम से प्रभावित होकर हमारे साथ आएं। दूसरों को सुधारना कठिन है लेकिन स्वयं को सुधारना आसान है अतः हमें इस आसान कार्य को प्रारंभ कर देना चाहिए। हम जब कुछ प्रयास करेंगे तभी कुछ सुधार होगा ऐसे बैठे रहने से कुछ होने वाला नहीं है।

सुधार का दूसरा उपाय यह है कि कड़े नियम लागू किए जाएं। जो नियमों का पालन ना करें उसको दंडित किया जाए। कभी-कभी तो मन करता है कि पान खाकर इस तरह गंदगी फैलाने वालों के मुंह पर इतना जोरदार थप्पड़ मारा जायेगा कि पान सड़क पर नहीं बल्कि वापस उनके अंतड़ियों में घुस जाए। दुनिया के विकसित देशों में उनकी सड़कें यदि थूक के अभिशाप से मुक्त है तो उनका यही कारण है कि वहां के नियम विधान कठोर हैं। मनुष्य की यह प्रवृत्ति है कि वह सुधरना नहीं चाहता है। हमारे देश के एयरपोर्ट और मेट्रो स्टेशन यदि साफ है तो उनका कारण यही है कि वहां के नियम विधान कठोर हैं और किसी की हिम्मत नहीं कि वहां पर थूक दें। हमारे ही शहर के लोग जो यहां की सड़कों पर गंदगी मचाए रहते हैं वही ऐसे एयरपोर्ट और मेट्रो स्टेशन जैसे स्थानों पर जाते हैं तो उनकी हिम्मत नहीं पड़ती है कि वहां पर अपनी गंदगी का प्रदर्शन करें।ऐसे लोगों को शारीरिक दंड देने की आवश्यकता नहीं है बल्कि उनसे जुर्माना वसूला जाए। पैसे की बात लोगों को जल्दी समझ में आती है। वरना ऐसे गधे लोग मानने वाले नहीं हैं कि स्वयं से इनमें सुधार आ जाए।अधिकांश क्षेत्रों में हम देखते हैं कि सुधार का प्रमुख कारण दंड विधान का कठोर होना ही होता है। हमारे सामने तब बड़ी हास्यास्पद स्थिति उपस्थित होती है जब हमारे यहां के दो लापरवाह लोग बात करते हैं कि फलाने विकसित देश की व्यवस्था ऐसी है वहां की सड़कें इतनी साफ हैं लेकिन अपने सड़कों को साफ रखने के लिए भी कुछ नहीं करना चाहते हैं । यह लोग कहते हैं कि हिंदुस्तान कभी नहीं सुधरेगा। हिंदुस्तान के न सुधरने का कारण है कि यह लोग हिंदुस्तान के अभिन्न अंग हैं और जब तक हम इनको नहीं सुधारेंगे तब तक देश नहीं सुधरेगा। अतः इनको सुधारने के लिए ऐसे नियम बनाए जाए कि इस तरह गंदगी करने के बारे में लोग सोच भी ना सके। अंत में यह कहना चाहूंगा कि ऐसा नहीं कि हर पान खाने वाला व्यक्ति इसी प्रकार का व्यवहार करता है, कुछ लोगों को अपने कर्तव्यों का ज्ञान है कि उन्हें कहां थूकना चाहिए। हमें ऐसे ही सभ्य नागरिकों की आवश्यकता है।

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