दिल्ली विधानसभा चुनाव और कांग्रेस

दिल्ली विधानसभा 2020 का संघर्ष प्रारंभ होने से पहले ही कांग्रेस उस संग्राम से बाहर प्रतीत होती है।2014 के लोकसभा चुनाव के बाद शायद ही कोई ऐसा राज्य रहा हो जहां सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने पुनः वापसी की हो। इस पुरानी पार्टी की प्रासंगिकता अब वही रह गई है जहां वह भाजपा के साथ सीधे द्विपक्षीय लड़ाई में हो अन्यथा राज्यों के त्रिकोणीय संघर्ष में यह पार्टी तीसरे नंबर पर ही रह जाती है।लगता है इस पार्टी का कार्य क्षेत्रीय पार्टियों को समर्थन देकर भाजपा को रोकना ही रह गया है। हाल ही में संपन्न हुए हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव से यह स्थिति स्पष्ट होती है। महाराष्ट्र और झारखंड में भाजपा सरकार ना बना सकी लेकिन उसने दोनों राज्यों में कांग्रेस से ज्यादा सीटें प्राप्त की। स्पष्ट है कि अभी भी कांग्रेस भाजपा को सीधी टक्कर देने में सक्षम नहीं है। यही कारण है ऐसे राज्य जहां भाजपा के सामने क्षेत्रीय पार्टियां सीधे मुकाबले में खड़ी हैं वहां पर हर बार कांग्रेस को समझौता करना पड़ता है।2017 के यूपी विधानसभा चुनाव जिसमें 403 सीटें थी कांग्रेस सपा के साथ मिलकर 100 सीटों पर लड़ी और उसे केवल 7 सीटें ही मिल सकीं। यही हाल अधिकतर राज्यों का रहा है।

दिल्ली में 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को केवल 8 सीटें ही मिली थी।2014 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमा लिया और कांग्रेस को कुछ भी नहीं मिला। इसके बाद 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी 70 सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल पाया।कांग्रेस के लिए दिल्ली की सत्ता को प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है। यह वही दिल्ली है जहां कांग्रेस पार्टी की शीला दीक्षित 3 दिसंबर 1998 से 28 दिसंबर 2013 तक लगातार मुख्यमंत्री रहीं। वह किसी भी भारतीय राज्य की सबसे अधिक समय तक रहने वाली महिला मुख्यमंत्री भी थी। साथ ही दिल्ली की सबसे अधिक समय तक रहने वाली मुख्यमंत्री भी रहीं। कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा चुनाव 2019 के समय दिल्ली का प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया था।

किंतु अब की परिस्थितियों को देखकर लगता है कि वह दिन अब कांग्रेस के लिए केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में आने से रहें। कारण है इनके परंपरागत वोट का खिसक कर आम आदमी पार्टी के खाते में चले जाना।पूरे भारत में देखा जा सकता है कि भाजपा विरोधी लोग भाजपा को रोकने के नाम पर किसी भी पार्टी को वोट देने को तैयार रहते हैं जो इस हिंदुत्ववादी पार्टी से मजबूती से लड़े। यही तथ्य कांग्रेस के लिए हानिकारक हो रहा है जो मानसिक रूप से उसके वोटरों को दूसरे पार्टियों की तरफ मोड़ देता है। कांग्रेस के कमजोर जनाधार के कारण वे चाहते हुए भी उसे वोट नहीं दे पाते हैं।

लेकिन दिल्ली के सिंहासन को प्राप्त करने के लिए कांग्रेस अपना पूरा दम लगा रही है। शीला दीक्षित के कार्यों को लेकर कांग्रेस जनता के बीच में जा रही है।दिल्ली का यह हाल है और प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को खड़ा करने का प्रयास कर रही हैं। यह देखना रोचक होगा कि 11 फरवरी 2020 को कांग्रेस पार्टी के लिए दिल्ली विधानसभा चुनाव का परिणाम कैसा रहता है।

चुनाव का हुआ आगाज

किसके सिर सजेगा ताज

पंजा करेगा धमाल

या फिर होगा बेहाल

लोग इसे समझते हैं वोटकटवा

क्या फिर निकलेगी इसकी हवा

क्या लौटेगी इसकी शान

या फिर धूमिल होगा पंजे का निशान

11 फरवरी आएगा

भाग्य इसका बतलायेगा।

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