नौकरी प्राप्त कर लेने वाले को पुनः आरक्षण क्यों!

आरक्षण की यह आग

करेगी सबका विनाश

हकदार को मिल नहीं पाता

धनवान इसका लाभ उठाता

पिछड़े वर्ग में ही एक को उच्च बनाता

दूसरा पाताल में दबता जाता

संपन्न नहीं करता निचले का सम्मान

केवल चुनाव के समय याद आता है वह इंसान।।

हमारे देश में आरक्षण एक बड़ा मुद्दा है। आए दिन इस पर बहस होती रहती हैं। पक्ष और विपक्ष में खूब तर्क दिए जाते हैं। जिन्हें आरक्षण मिलता है वह इसके पक्ष में तर्क देते हैं तथा जिन्हें आरक्षण नहीं मिलता है वह इसके विपक्ष में तर्क देते हैं। दोनों के अपने-अपने प्रासंगिक तर्क हैं।दोनों पक्ष यह समझने में असमर्थ हैं कि वास्तव में सत्य क्या है और आरक्षण का उचित अधिकार कौन रखता है?

भारत का इतिहास बहुत प्राचीन रहा है। आज भी कई बातें समझ से परे हैं। आरक्षण की जड़ में विभिन्न प्रकार की जातियां हैं जिनके कारण हमारे देश में यह व्यवस्था लागू करनी पड़ी। भारत में इतनी जातियां कहां से आ गई यह विचार करते हुए माथा चकरा जाता है क्योंकि विश्व के किसी भी देश में उनके निवासियों के मध्य जाति के आधार पर विभेद नहीं है।

हमने धर्म और रंग के आधार पर विश्व के कई देशों में मानव के बीच टकराव को देखा है लेकिन जातियों के बीच टकराव भारत में एक विशेष बात है।

जब हम आरक्षण पर बात करते हैं तो जातियों के विषय में बात करना भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि उन्हीं के आधार पर उनकी संपन्नता या विपन्नता तय होती है।हमारे यहां व्यक्ति के उपनाम को जानकर ही उसके धनी या निर्धन होने के बारे में जाना जा सकता है। कुछ उपनाम वालों के बारे में हमारी सामान्य धारणा रहती है कि वह संपन्न होंगे । इसी तरह अन्य लोगों के बारे में आप अनुमान लगा सकते हैं। ध्यान रहे कि यह अनुमान आप अमेरिका और ब्रिटेन में नहीं लगा सकते हैं ।अतः कुछ ऐसा वर्ग है जिसके अधिकतर लोग संपन्न है तथा कुछ ऐसा वर्ग है जिसके अधिकतर लोग गरीब हैं। अतः आरक्षण की आवश्यकता सार्थक सिद्ध होती है लेकिन ध्यान रहे कि यह सही व्यक्ति और आवश्यकता वाले को दिया जाए ताकि वह समाज की मुख्यधारा में आ सके।

नौकरी वाले को आरक्षण का लाभ क्यों??

कुछ कमजोर वर्गों को आरक्षण इसलिए दिया गया कि वह समाज की मुख्यधारा में आ सके और उनका शोषण रुक सके। यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि अधिकांश नौकरियां उन्हीं लोगों द्वारा प्राप्त की जाती हैं जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी होती है। यदि 100 भर्तियां किसी पद पर हुई तो लगभग 80 पद ऐसे लोगों द्वारा प्राप्त किए जाते हैं जिनके माता-पिता किसी सरकारी नौकरी में पहले से ही होते हैं या व्यापार से उनका अच्छा ‌आर्थिक स्त्रोत होता है।दलित और पिछड़े वर्ग के कुछ ऐसे ही समर्थ लोग नौकरियों पर कब्जा जमा लेते हैं और उन्हीं वर्गों की कुछ जातियां आज तक अपना उत्थान नहीं कर पाई हैं। दलितों और पिछड़ों में उनके वर्ग के अंदर भी आपस में बहुत असमानता है।कुछ जातियां अपना अच्छा विकास कर गई हैं तथा कुछ अभी भी निचले स्तर पर जीवन यापन कर रहे हैं। इसी कारण ऊपर वाले ऊपर ही जा रहे हैं तथा नीचे वाले और निचले स्तर तक पहुंच जा रहे हैं।

अतः इसका एक समाधान यह हो सकता है कि आरक्षित श्रेणी में जो व्यक्ति एक बार नौकरी पा जाए उसके बच्चों को आरक्षण ना दिया जाए और उसका आरक्षण उसी जाति के ऐसे व्यक्ति को जिया जाए जिसने कभी आरक्षण के तहत नौकरी ना प्राप्त की हो।इसका लाभ यह होगा कि उन वर्गों में जो अति पिछड़े लोग हैं वह आरक्षण का लाभ ले पाएंगे जो कि वह अपने वर्ग के व्यक्ति के साथ प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट जाते थे।इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि दलितों और पिछड़ों के अंदर भी जो आर्थिक आधार पर एक अगड़ा और पिछड़ा उपवर्ग बनता जा रहा है वह नहीं बन पाएगा और इनमें आर्थिक आधार पर समानता आएगी।क्योंकि कहीं ना कहीं अपने स्वार्थ और राजनीति के कारण पिछड़े वर्ग के संपन्न लोग अपनी जातियों का ही अहित कर रहे हैं।

अगर हम दूसरे तथ्य पर ध्यान दे तो हम देखते हैं कि चाहे दलित या पिछड़े वर्गों की राजनीति की बात करें तो इनमें भी प्रतिनिधित्व तो उन्हीं लोगों का होता है जो संपन्न होते हैं। मीडिया के सामने गला फाड़ने वाला सफाई कर्मी, रिक्शावाला या मजदूर नहीं होता है। पिछड़ी जातियों के संपन्न लोग ही चुनाव लड़ते हैं, भाषण देते हैं और वही लोग टिकट खरीद कर आगे बढ़ते हैं। जब यह लोग इतना पैसा लगा रहे हैं और अपने मुंह को कष्ट दे रहे हैं तो यह कहना कठिन होगा कि यह लोग अपने आप को आरक्षण की सीमा से बाहर करके समाज में समानता लाने का प्रयास करेंगे। अतः इसका भी उपाय यह है कि जो एक बार आरक्षण का लाभ लेकर सांसद या विधायक बन जाए उसको पुनः आरक्षण का लाभ न दिया जाए ताकि उसके समुदाय का दूसरा व्यक्ति आरक्षण का लाभ ले सके और चुनाव लड़ सकें। इस प्रकार अधिक लोग समानता के स्तर तक आ सकते हैं अन्यथा जातियों के अंदर ही गुटबाजी और वैमनस्य बढ़ता जाएगा। जाति और धर्म के आधार पर टकराव देश के लिए घातक होता है।

यदि सामान्य जन तनिक सचेत होंगे और अपने जनप्रतिनिधियों के सामने इस तर्क को प्रस्तुत करें तो अवश्य ही मुझे लगता है कि दलितों और पिछड़ों में उनके समूह के अंदर ही व्याप्त असमानता कुछ दूर हो सकती है।

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