भारत चीन संघर्ष और भारतीयों की देशभक्ति

 

क्या आपको लगता है कि आप देश भक्त हैं? यदि हां तो क्यों है?
अधिकांश लोगों के लिए आज सरकार का समर्थन या विरोध ही देशभक्ति का पर्याय बन चुका है। समर्थन करने वाले समझते हैं कि यह मेरा राष्ट्र धर्म है तथा विरोधियों को लगता है कि विरोध के माध्यम से ही वह अपनी सच्ची देशभक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं।

सरकार के विरोध में बोलना गलत नहीं है लेकिन साथ ही साथ राष्ट्र की उन्नति के लिए अपना योगदान देना भी तो महत्वपूर्ण है। वर्तमान परिस्थितियों में यदि चीन के सामानों का बहिष्कार करने से राष्ट्र को कुछ लाभ हो रहा है तो ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए।

कुछ लोग सैनिकों की शहादत पर सरकार को कोस रहे हैं लेकिन यदि वे चाइनीज मोबाइल के बिना जीवन यापन नहीं कर सकते हैं तो यह कैसी देशभक्ति है। कुछ इतने भी निर्लज्ज पड़े हुए हैं जिन्हें लगता है कि चलो सैनिकों की शहादत के बहाने सरकार को नीचा दिखाने का एक मौका मिल गया।
चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की कीमत (62 बिलियन डॉलर)के बराबर पैसा चीन भारत से केवल 1 साल में कमा लेता है। अगर इसमें हम 5 बिलियन डॉलर की भी कमी कर पाए तो बहुत बड़ी बात होगी।प्रयास भले ही छोटा हो लेकिन कम से कम हो तो।
जलबिंदुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घट:।
(बूंद बूंद से घड़ा भरता है)।

वैसे भी चीन के विरुद्ध गुस्सा स्वभाविक है क्योंकि इसने एक वायरस के माध्यम से पूरी दुनिया को भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। कई लोगों की नौकरियां चली गई। कई लोगों को खाना नहीं मिल रहा है तथा कई लोगों को चिकित्सा नहीं मिल पा रही है। अगर आपको लगता है कि यह हालत केवल भारत में है तो आप गलत हैं। कई देशों में इस से भी खतरनाक स्थिति है जिसका केवल अकेला कारण चीन है।इसके पहले सब लोग कितनी शांति से अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। लेकिन इस वायरस के कारण सबको कष्ट हुआ और अब भी हो रहा है स्थिति सुधारने की कोई संभावना नहीं दिख रही है।इस स्थिति में चीन का बहिष्कार तो करना ही चाहिए।यदि आप अब भी भारत सरकार के विरोध में हैं तो यह कहा जा सकता है कि आप हमारे उन दो नादान पड़ोसियों नेपाल और पाकिस्तान की तरह हो गए हैं जो चीन द्वारा बांटे गए कोरोना के प्रसाद का सेवन कर रहे हैं फिर भी उन्हें चीन से प्रेम है और भारत से घृणा है।

अपने घर परिवार की संपन्नता के लिए हम दिन-रात प्रयासरत रहते हैं लेकिन अपने देश के लिए हमारे अंदर इतनी उत्सुकता नहीं रहती है। हम अपने देश को बदलने का प्रयास नहीं करते बल्कि उसकी गंदगी और गरीबी के लिए उसको कोसते रहते हैं। ध्यान रखिए अंधेरे को कोसने से कुछ नहीं होगा, अंधेरे से मुक्ति पानी है तो कम से कम एक दीपक तो जलाना ही पड़ेगा।हम लोगों में यह सबसे बड़ी कमी है कि हम आलोचना तो तुरंत करने लगते हैं लेकिन सुधार के लिए एक कदम भी नहीं बढ़ाना चाहते हैं।

केवल यह बात ही महत्व नहीं रखती है कि हमारी सेना या सरकार क्या कर रही है।यह बात ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम क्या कर सकते हैं। क्या हमारा कर्तव्य केवल चाय और पान की दुकान पर बैठकर राजनीतिक चर्चा करना है।
भार के रूप में लगने वाली देश की इस बड़ी आबादी को एक अवसर के रूप में बदलने का समय आ गया है।
इस समय जब चीनी सामानों के बहिष्कार की बात हो रही है तो सरकार का विरोध करने वाले लोग उसका मजाक उड़ा रहे हैं। यह लोग चाहे तो अपने समर्थकों को बहिष्कार के लिए प्रेरित करके देश को बहुत लाभ पहुंचा सकते हैं। लेकिन इनके लिए देशभक्ति का मतलब सरकार का विरोध मात्र है।
जब देशवासी अंग्रेजों को देश से बाहर निकाल सकते हैं तो चीन के सामानों का बहिष्कार क्यों नहीं कर सकते। माना कि पूर्ण रूप से नहीं कर सकते लेकिन कुछ तो कर सकते हैं।
नागरिकता कानून संशोधन के विरोध में यह फर्जी लोकतंत्र रक्षक सड़क पर लाठियां खाने के लिए तैयार थे लेकिन देश के लिए चीन के सामानों का बहिष्कार करने के लिए तैयार नहीं। हाल यह है कि यदि सरकार   स्वदेशी की बात करे तो यह लोग विरोध में विदेशी सामानों का समर्थन करेंगे।
भारत में आज एक ऐसा वर्ग है जो अपनी कट्टर सोच के कारण मोदी का विरोध लगातार करता है लेकिन चीन का विरोध करने के लिए मैदान में नहीं आ सकता। मोदी को नीचा दिखाने के लिए इन्हें राष्ट्र को झुकाने में भी कोई शर्म नहीं।

राष्ट्र के लिए प्राणों का उत्सर्ग कर देना सामान्य बात नहीं। सीमा पर कोई देश की सुरक्षा के लिए शहीद हो जाता है और देश के अंदर हम लोग तुच्छ राजनीति में व्यस्त रहते हैं। सीमा पर हमारे सैनिक शत्रु से लड़ रहे हैं लेकिन देश के अंदर रहकर भी हम शत्रु को हरा सकते हैं।एक देशभक्त होने के लिए सीमा पर प्राणों का त्याग करना केवल एक विकल्प नहीं है। शत्रु को हराने के लिए अर्थ नीति आज महत्वपूर्ण हो चुकी है।
जिसके पास धन रहता है उसमें घमंड आ ही जाता है। किसी को निर्धन कर दो उसका घमंड अपने आप चला जाता है।
चीन को हराने के लिए भारतीयों को इसी अर्थनीति की आवश्यकता है। भारत, चीन सहित पूरी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा बाजार है।यदि हम विदेशियों का सामान प्रयोग करके उनको अमीर बना सकते हैं तो स्वदेशी सामान प्रयोग  करके अपने देश को संपन्न क्यों नहीं कर सकते।
बहिष्कार व्यावहारिक होना चाहिए आदर्शवादी नहीं। आज कोई भी देश पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर नहीं सबको एक दूसरे की आवश्यकता है। बहिष्कार के चक्कर में हमें अपनी हानि नहीं करवानी। जो वस्तुएं हमारे यहां उपलब्ध हैं कम से कम वह चीजें हमें अपने देश की ही प्रयोग करनी चाहिए।

एक छोटा सा प्रयास हमें बड़ी उपलब्धि की ओर ले जा सकता है। बस हमारे अंदर थोड़ी ईमानदारी होनी चाहिए। जब तक हमारी देशभक्ति बातों से ही परिलक्षित होगी हमारे कर्मों से नहीं तब तक हमारी इस देशभक्ति का कोई लाभ नहीं।

यदि सरकार का विरोध करने वाले लोग अपने समर्थकों से कह दे की चीन के सामानों का बहिष्कार करें तो उनके समर्थक ऐसा करेंगे जो भारत के लिए अच्छा होगा।
कुछ भारतीयों के द्वारा डाउनलोड किया जाने वाला आरोग्य सेतु एप दुनिया में सातवां सबसे ज्यादा डाउनलोडिंग ऐप बन गया। यह बात हमें बहुत कुछ बताता है. यदि केवल भारत के लोग ही भारतीय वस्तुओं  का प्रयोग करें तो भी भारत शीर्ष  स्थान तक जा सकता है।

भारत के विपक्ष का हाल यह है कि भारत सरकार को नीचा दिखाने के लिए देश के शत्रुओं का समर्थन करना सामान्य बात हो गई है। यदि पाकिस्तान कह दे कि उसने भारत के 10 सैनिकों को मारा है तो भारत का विपक्ष इस पर विश्वास कर लेगा और यदि भारत सरकार कहे कि हमने पाकिस्तान के 20 आतंकवादियों को मारा तो यह लोग उसका प्रमाण मांगने लगते हैं।

हाल ही में बेंगलुरु में ओवैसी की सभा में एक लड़की ने जब पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लगाया तो भी यह फर्जी लोकतंत्र रक्षक उसके समर्थन में आ गए थे। भारत के अवार्ड प्राप्त पत्रकार ने उसका समर्थन करते हुए कहा कि किसी भी देश को मुर्दाबाद नहीं करना चाहिए। न जाने क्यों भारत में आतंक की सप्लाई करने वाले पाकिस्तान से इन लोगों को इतना प्रेम है।

कोई राष्ट्र कितना अच्छा है यह उस देश के नागरिकों पर निर्भर करता है। शत्रु का सामना केवल देश की सीमा पर खड़े सैनिक ही नहीं करते अपितु देश के अंदर रहने वाले नागरिक भी  अपने अच्छे कार्यों से शत्रु को  करारा जवाब दे सकते हैं। नागरिकों के बीच एकता के अभाव में राष्ट्र कमजोर हो जाता है।

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