संथाल विद्रोह कब हुआ था

 संथालों के विद्रोह का समय 1855-56 है।संथाल विद्रोह वर्तमान झारखंड में संथाल लोगों द्वारा अंग्रेजों और जमींदारों के विरुद्ध किया गया। मुंगेर से राजमहल के बीच का क्षेत्र दामन- ए -कोह के नाम से जाना जाता था जो संथाल बहुल क्षेत्र था। यहां के हजारों संथालों ने गैर आदिवासियों को भगाने तथा अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए जोरदार संघर्ष छेड़ा। संथाल आन्दोलन  भूमिकर अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले दुर्व्यवहार तथा जमींदार, साहूकार आदि द्वारा किए जाने वाले शोषण और अत्याचार के विरुद्ध था।

संथाल विद्रोह बिहार से लेकर उड़ीसा तक वीरभूम, सिंहभूम, बांकुड़ा, मुंगेर, हजारीबाग और भागलपुर जिलों में विशेष रूप से केंद्रित था। इस विद्रोह के नेता के रूप में ‘सिद्धू’ तथा ‘कान्हू’ का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। अंग्रेजों ने बड़ी सैनिक कार्यवाही के बाद 1856 ई. में इस विद्रोह को दबाने में सफलता पाई। विद्रोह का नेतृत्व चार मुर्मू भाइयों सिद्धू, कान्हू, चांद तथा भैरव ने किया। संथालों ने जातीय आधार पर अपनी पहचान बनाई थी।

संथालों का विद्रोह बंगाल प्रेसीडेंसी के जनजातीय इलाकों में उस तानाशाही राजस्व व्यवस्था के विरुद्ध था जो जमींदारों द्वारा निर्दयतापूर्वक भारत में लागू किया गया था। यह विद्रोह विकृत राजस्व व्यवस्था के द्वारा फैलाए जा रहे औपनिवेशिक शासन के दमन के विरुद्ध था। संथाल लोग जंगलों में रहते थे तथा उन्हीं पर आश्रित रहते थे। यहां यह उल्लेख कर देना महत्वपूर्ण है कि यह मेहनती किसान होते थे।

वर्तमान झारखंड में सन 1832 में अंग्रेजों ने स्वयं संथालों को आमंत्रित किया और उनके लिए इन क्षेत्रों में स्थान आरक्षित कर दिए। जमीन और आर्थिक सुविधाओं के वादे पर बहुत से संथाल कटक, हजारीबाग, मिदनापुर, मुर्शिदाबाद आदि क्षेत्रों से इन स्थानों की ओर चल पड़े। कर संग्रह से अंग्रेजों को फायदा होने लगा। लेकिन शीघ्र ही संथाली और अंग्रेजों के मध्यस्थ के रूप में महाजन और जमींदारों ने इनका शोषण प्रारंभ कर दिया। इन्हें ऊंचे ब्याज पर पैसे दिए जाने लगे और जब यह पैसे लौटाने में असमर्थ हो गए तो जबरदस्ती इनकी जमीनों पर कब्जा कर लिया गया और यह एक बंधुआ मजदूर बनकर रह गये। इस शोषण के विरुद्ध सिद्धू और कान्हू नामक दो भाइयों ने विद्रोह प्रदर्शनों का नेतृत्व किया जिन्हें अंग्रेजों द्वारा हरा दिया गया।

30 जून 1855 को 2 विद्रोही नेता सिद्धू और कान्हू मुर्मू ने 10000 संथालों के भीड़ को एकत्रित किया और अंग्रेजी उपनिवेश शासन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध समानांतर सरकार चलाने की घोषणा कर दी। इनका उद्देश्य था अपने नियम बनाकर स्वयं कर संग्रह करना।

इसकी घोषणा के बाद शीघ्र ही संथालों ने हथियार उठा लिया। कई गांवों में जमींदारों और साहूकारों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस अचानक और खुले विद्रोह से ब्रिटिश शासन आश्चर्यचकित हो गई। प्रारंभ में सेना की एक छोटी टुकड़ी इस विद्रोह को दबाने के लिए भेजी गई जो असफल रही और इसने विद्रोह की अग्नि को और बढ़ा दिया। जब कानून व्यवस्था अंग्रेजों के हाथ से बाहर जाने लगा तो उन्होंने एक बड़ा कदम उठाते हुए अधिक मात्रा में सैनिकों को भेजा है जिनकी सहायता मुर्शिदाबाद के क्षेत्रीय जमींदार और नवाबों ने भी किया। सिद्धू और कान्हू को पकड़ने के लिए अंग्रेज सरकार ने पुरस्कारों की घोषणा कर दी।

इसके बाद अंग्रेजों और संथालों के बीच कई झड़प हुए जिनमें अधिक मात्रा में संथाल मारे गये। अंग्रेजों के आधुनिक हथियार के आगे संथालों के परंपरागत हथियार टिक नहीं सके।संथालों ने अंग्रेजों के विरुद्ध तीर धनुष और भालों का प्रयोग किया। जुलाई 1855 से जनवरी 1856 के बीच प्रमुख रूप से दोनों पक्षों के बीच संघर्ष हुआ।

विद्रोह का बड़ी निर्दयता पूर्वक दमन कर दिया गया। संथालों के दोनों प्रमुख नेता मारे गए। मुर्शिदाबाद के नवाब द्वारा भेजे गए हाथियों से उनके झोपड़ियों को गिरा दिया गया तथा ब्रिटिश आर्मी द्वारा ऐसे ही कई अत्याचार इस विद्रोह को दबाने के लिए किए गए। विद्रोह में लगभग 60,000 जनजातीय लोग शामिल थे जिनमें से 15000 मारे गए और 10 गांवों को नष्ट कर दिया गया। अंग्रेजो की तरफ से मेजर जनरल बरो ने सेना का नेतृत्व किया।

चार्ल्स डिकेंस ने अपने साप्ताहिक पत्रिका हाउसहोल्ड वर्ड्स में लिखा –

“इन आदिवासियों के मध्य सम्मान की भी एक भावना दिखाई देती है। यह कहा जाता है कि यह लोग शिकार करने के लिए विषयुक्त तीरों का प्रयोग करते हैं लेकिन अपने शत्रुओं के विरुद्ध नहीं।यदि ऐसा है और हम हाल ही के संघर्ष में विषयुक्त तीरों के बारे में कुछ नहीं सुनते हैं तो अवश्य यह अनंतरूप से हमारी सभ्य आर्मी से भी ज्यादा सम्मानजनक बात है।”

इस विद्रोह के बाद संथाल परगना का गठन किया गया तथा सरकार द्वारा संथाल परगना टेनेंसी एक्ट को पास किया गया।

हालांकि इस घटना के महत्व को आगामी कई विद्रोहों द्वारा आच्छादित कर दिया गया फिर भी संथाल विद्रोह की घटना संथाल लोगों के गर्व और पहचान में आज भी जीवंत है। सिद्धू और कान्हू के संघर्ष की प्रशंसा रविंद्र नाथ टैगोर ने भी की है। स्वतंत्र भारत में प्रथम जनजातीय प्रांत झारखंड का गठन इन संथालियों के त्याग और अभिमान का एक स्पष्ट उदाहरण है.

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