सन्यासी विद्रोह (1770-1800)

सन्यासी विद्रोह ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बंगाल में फकीरों और संन्यासियों का हिंसक विद्रोह था। यह विद्रोह 1770 ईस्वी से प्रारंभ होकर 1800 ई. तक चला। लेकिन पूर्ण रूप से इसका अंत 1820 ई. में हुआ। इस हिंसक विद्रोह के दौरान उन्होंने अंग्रेजों की कई कोठियों और कार्यालयों को लूटा। इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे।माना जाता है कि उनके धार्मिक क्रियाकलापों पर प्रतिबंध लगाने के कारण यह विद्रोह भड़का। बंगाल में मुर्शिदाबाद और बैकुंठपुर के जंगल आंदोलन का केंद्र रहे। यह आंदोलन पश्चिम में पटना तक फैला था। इसमें जमींदार कृषक तथा शिल्पकारों ने भी भाग लिया। बांग्ला भाषा के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार बंकिमचन्द्र चटर्जी का सन 1882 में रचित उपन्यास आनन्दमठ इसी विद्रोह की घटना पर आधारित है।

  कुछ लोग इसे विदेशी शासन के खिलाफ भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रथम युद्ध मानते हैं क्योंकि 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद इन क्षेत्रों में कर संग्रह का अधिकार ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया गया था जिसके कारण वहां के जमींदारों, कृषकों और मजदूरों का शोषण अत्यधिक बढ़ गया। कुछ इतिहासकार इसे हिंसक डकैती की संज्ञा देते हैं जो 1770 में बंगाल के अकाल के बाद प्रारंभ हुआ था। इस विद्रोह के दौरान विद्रोहियों और अंग्रेजो के विरुद्ध कई सालों तक गोरिल्ला वार की स्थिति बनी रही।इस विद्रोह के दौरान कई अंग्रेज सैनिक भी मारे गए। अंततः वारेन हेस्टिंग्स ने दमनआत्मक कार्यवाही करते हुए क्रूरता से इस विद्रोह को समाप्त कर दिया।

यह विद्रोह किसी एक जातीय समूह या संगठन द्वारा प्रारंभ नहीं किया गया था।विद्रोह का प्रारंभ कहां से हुआ और उसके क्या कारण थे यह विशेष रूप से स्पष्ट नहीं है। विद्रोह के कई कारण बताए जाते हैं। कई घटनाएं विद्रोह को हवा देने के लिए उत्तरदायी थी जिसमें बक्सर का युद्ध और इन क्षेत्रों के कर संग्रह का अधिकार अंग्रेजों के हाथ में चला जाना जैसी घटनाएं महत्वपूर्ण रही हैं। तीन कारण प्रमुख है जो अग्रलिखित हैं।

इससे जुड़ी एक घटना यह भी है कि उस समय उत्तर भारत से अधिक मात्रा में हिंदू सन्यासी बंगाल के धार्मिक स्थलों की ओर यात्रा करने जाते थे और यह लोग बंगाल के जमींदारों और भू स्वामियों से धार्मिक यात्रा के लिए कुछ धन की मांग करते थे। संपन्नता के समय में यह जमींदार सहर्ष इन सन्यासियों की सेवा करते थे।लेकिन जब से इन क्षेत्रों में कर संग्रह का अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ में चला गया यह जमींदार और भूस्वामी धार्मिक यात्रा करने वाले सन्यासियों की सेवा करने में असमर्थ हो गए क्योंकि उनके हाथ अब स्वयं खाली हो गए। यही कारण था कि इस विद्रोह में वे भी सन्यासियों के साथ थे। 1770 में आए बंगाल के अकाल ने स्थिति को और भी विकट बना दिया जिसमें बंगाल की लगभग एक तिहाई जनता यमलोक चली गई।

दूसरी घटना के रूप में बताया जाता है कि मजनून शाह जो फकीरों के एक बहुत बड़े समूह के नेता थे बंगाल से यात्रा कर रहे थे और 1772 में बिना किसी कारण के उनके समूह के 150 लोगों की हत्या कर दी गई। ऐसे दमनात्मक कार्यों के कारण ही वर्तमान बांग्लादेश के रंगपुर के नाटौर में भयानक हिंसा भड़की थी।

हिंदू संप्रदाय के दसनामी नागा सन्यासी भी बंगाल में धार्मिक यात्रा पर जाते थे और वहां से कुछ धन इकट्ठा करते थे। अंग्रेज इन्हें लुटेरे मानते थे और बंगाल में इनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। उनको लगता था कि बड़ी संख्या में यह समूह कंपनी के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है।

यही कुछ कारण था जिसके लिए अंग्रेजों के विरुद्ध सन्यासियों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने इनके विरुद्ध हिंसा का रास्ता अपनाया।

अंततः जब कंपनी ने 18वीं शताब्दी के अंतिम तीन दशकों में इन सन्यासियों और फकीरों को बंगाल में प्रवेश करने और वहां से धन इकट्ठा करने के लिए रोका तो दोनों पक्षों में भयानक संघर्ष प्रारंभ हुआ। कंपनी को इनसे काफी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। सन्यासियों का दमन करना कंपनी के लिए आसान नहीं था।अधिकांश संघर्ष बंगाल में आए अकाल के बाद प्रारंभ हुआ जब स्थिति अत्यधिक खराब हो गई।जब कंपनी के सैनिक विद्रोहियों का पीछा करते तो वे जंगल में भाग जाते और अंग्रेजी सेना के जंगल में प्रवेश करने पर उनकी हत्या कर देते हैं। विद्रोहियों ने अंग्रेजों के काफी संपत्ति को लूटा। वीरभूम और मिदनापुर के जंगली और ग्रामीण इलाकों में कंपनी की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी, यही कारण था कि संन्यासी विद्रोह ने इन्हें बहुत परेशान किया। अपने श्रेष्ठ प्रशिक्षण और सैनिकों के होते हुए भी कंपनी इन के सामने असहाय साबित हुई।

मजनून शाह, मूसा शाह, भाबनी पाठक तथा देवी चौधरानी इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे। मजनून शाह एक स्थान से दूसरे स्थान तक यात्रा कर लोगों को संघर्ष के लिए प्रेरित करते थे। उनके मारे जाने के बाद उनके भाई मूसा शाह ने कुछ समय तक आंदोलन की कमान संभाली। बाद में चिराग शाह ने फकीरों का नेतृत्व किया।

भाबनी पाठक का समाज के गरीब तबकों से ज्यादा लगाव था वह बंगाल के रॉबिनहुड के रूप में स्वीकार्य थे। अंग्रेज उन्हें एक लुटेरा मानते थे। भाबनी पाठक के मारे जाने के बाद देवी चौधरानी ने सन्यासी विद्रोह को दिशा दी।

अंग्रेजों के विरुद्ध होने वाला यह विद्रोह कोई ऐसा विद्रोह नहीं था जो एक ही समय में हुआ हो बल्कि दीर्घकालीन समय के लिए यह अंग्रेजो के विरुद्ध सन्यासियों का एक छापामार युद्ध था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने बहुत कठिनाई से वारेन हेस्टिंग्स के नेतृत्व में इस विद्रोह का दमन किया। जीन गांव वालों पर इन विद्रोहियों की सहायता करने का संदेह होता था उन्हें तुरंत गोली मार दी जाती थी या उनके खेत में ही उन्हें फांसी पर लटका दिया जाता था।

सन्यासी विद्रोह बंगाल के पश्चिमी क्षेत्रों के जिलों में सामान्य जनता का अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन की श्रृंखला में पहला विद्रोह माना जाता है जिसमें 1855-56 का संथाली विद्रोह भी समाहित है। इस आंदोलन ने आगे के विद्रोह के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

 

 

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