सैयद वंश का इतिहास

सैयद वंश का संस्थापक खिज्र खां था। खिज्र खा ने सैयद वंश की स्थापना दिल्ली में 1414 ई. में की थी।
1398 में जब तैमूर ने दिल्ली पर आक्रमण किया था तो वापस लौटते समय उसने खिज्र खां को मुल्तान, दीपालपुर एवं लाहौर का गवर्नर बनाया था। उसी खिज्र खा ने 1414 में दौलत खा लोदी को पराजित कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया।

सैयद वंश के बारे में जानने का स्त्रोत तारीख ए मुबारकशाही नामक ग्रंथ है जिसकी रचना याहिया बिन अल अहमद सरहिंदी ने की थी। यह ग्रंथ सैयद वंश के दूसरे शासक मुबारक शाह को समर्पित है क्योंकि इस ग्रंथ की रचना उसी के शासनकाल में हुई थी।
सैयद वंश के शासकों का मूल निवास स्थान कहां था इसके बारे में कोई स्पष्ट जानकारी प्राप्त नहीं होती है।
खिज्र खां ने स्वयं को पैगंबर साहब का वंशज बताया है लेकिन इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

सैयद वंश का शासन काल 1414 से 1451 ईस्वी तक रहा जिसमें कुल 4 शासक खिज्र खां, मुबारक शाह, मोहम्मद शाह तथा अलाउद्दीन हसन शाह हुए। सैयद वंश के शासकों ने कुल 37 वर्षों तक शासन किया जो सल्तनत काल के किसी भी वंश द्वारा किया गया सबसे कम शासन है।

सैयद वंश का पहला शासक खिज्र खा रखा था जिसे सर्वप्रथम फिरोज तुगलक ने मुल्तान का सूबेदार नियुक्त किया था।

दिसंबर 1398 मैं तैमूर लंग ने दिल्ली पर आक्रमण किया था और यहां खूब लूटपाट मचाई थी।उसी ने वापस लौटते समय खिज्र खां को मुल्तान, दिपालपुर एवं लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया था।

दिल्ली का सुल्तान बनने के बाद खिज्र खां ने रैयत ए आला की उपाधि धारण की। रैयत ए आला आला का अर्थ होता है वह शासक जो किसी के अधीन शासन करता हो।सुल्तान बनने के बाद खिज्र खां नियमित रूप से तैमूर के पुत्र शाहरुख को कर भेजा करता था।

तैमूर के आक्रमण के बाद दिल्ली सल्तनत कई छोटे-छोटे टुकड़ों में बट गया था।खिज्र खां ने दिल्ली को एक करने का प्रयास किया लेकिन उसे पर्याप्त सफलता नहीं मिल सकी।खिज्र खां ने दिल्ली के सरदारों को उपाधियां देकर उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास किया था।

खिज्र खान ने ताज उल मुल्क को अपना वजीर बनाया था।
खिज्र खां ने अपने शासनकाल के दौरान मेवात, नागौर, बयाना, चंदावर, ग्वालियर, बदायूं तथा इटावा पर आक्रमण किया था। इनमें से कई राजाओं ने सुल्तानपुर कर देना स्वीकार किया था।
1421 में खिज्र खां की मृत्यु हो जाती है।

खिज्र खां के बाद उसका पुत्र मुबारक खां दिल्ली का सुल्तान बनता है। मुबारक खां ने शाह, सुल्तान तथा नायब अमीरुल मोमिनीन की उपाधियां धारण की। अब सैयद वंश के शासक खां नहीं बल्कि शाह कहलाने लगे।

मुबारक शाह ने सरवर उल मुल्क को वजीर का पद प्रदान किया तथा कमाल उल मुल्क को सेनापति बनाया।

मुबारक शाह ने सियालकोट के खोखर राजा जसरथ पर आक्रमण किया और जसरथ अपना राज्य ही छोड़ कर भाग गया।
कटेहार, काम्पिल और इटावा के राठौर राजाओं ने मुबारक शाह को कर देना स्वीकार कर लिया।

मुबारक शाह और सरवर उल मुल्क के मध्य विवाद हो गया और सरवर उल मुल्क ने मीरान शद्र तथा सिद्ध पाल के साथ मिलकर 1434 में मुबारक शाह की हत्या कर करवा दी।
मुबारक शाह की हत्या के बाद उसका दत्तक पुत्र मोहम्मद खां दिल्ली का शासक बना जो नाम मात्र का शासक था और वास्तविक सत्ता वजीर सरवर उल मुल्क के हाथों में थी।

मोहम्मद शाह ने सरवर उल मुल्क को खान ए जहां (संसार का स्वामी) की उपाधि प्रदान की। मोहम्मद शाह ने कमाल उल मुल्क को कमाल खां की उपाधि प्रदान की और उसे नायब वजीर का पद प्रदान किया।
1440 में मालवा के शासक महमूद खिलजी ने दिल्ली पर आक्रमण किया था किंतु मोहम्मद शाह ने समाना के सूबेदार बहलोल लोदी को बुलाया और अंत में मोहम्मद शाह तथा महमूद खिलजी के मध्य समझौता हो गया।

मोहम्मद शाह ने बहलोल लोदी को अपना पुत्र कहकर खान ए खाना की उपाधि प्रदान की।
1443 में मोहम्मद शाह की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र अलाउद्दीन हसन शाह (अलाउद्दीन आलम शाह) जो बदायूं का सूबेदार था दिल्ली का सुल्तान बना। अलाउद्दीन हसन शाह एक अयोग्य शासक था और उसका शासन बहुत दिनों तक नहीं चला। अलाउद्दीन हसन शाह को सैयद वंश का अंतिम शासक माना जाता है।

1447 में अलाउद्दीन हसन खां और उसके वजीर हुसाम खां के मध्य विवाद हो गया और अलाउद्दीन हसन शाह दिल्ली का शासन छोड़कर बदायूं चला गया।
दिल्ली का शासन छोड़ने से पहले अलाउद्दीन हसन शाह ने दिल्ली की सत्ता अपने वजीर हुसाम खां के नेतृत्व में अपने दोनों सालों शाहना शहर तथा अमीर कोहथे को सौंप दी थी।

1450 के अंत में अलाउद्दीन हसन शाह के दोनों सालों के मध्य विवाद हो गया और दिल्ली की जनता ने दोनों को गद्दी से उतार कर बहलोल लोदी को दिल्ली का शासक बना दिया।

कुछ इतिहासकारों का कहना है कि दिल्ली की सत्ता को लेकर अलाउद्दीन हसन शाह के सालों के मध्य युद्ध हुआ और दोनों की मौत हो गई और बहलोल लोदी को सत्ता प्राप्त हुई।

बहलोल लोदी ने दिल्ली की सत्ता प्राप्त करने से पहले अलाउद्दीन हसन शाह को दिल्ली आने के लिए आमंत्रित किया किंतु उसने कहा कि मैं बदायूं की सूबेदारी से ही संतुष्ट हूं। अतः इस प्रकार बहलोल लोदी दिल्ली का शासक बना और दिल्ली में लोदी वंश की स्थापना हुई।

 

 

 

 

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