हर्यक वंश का संस्थापक कौन था?

हर्यक वंश का संस्थापक बिंबिसार था। बिंबिसार 544 ईसा पूर्व में मगध का राजा बना। बिंबिसार की राजधानी गिरीव्रज(राजगृह) थी। बिंबिसार के विषय में हमें बौद्ध ग्रंथ महावंश से जानकारी मिलती है।

महावंश के अनुसार बिंबिसार 15 वर्ष की आयु में मगध का राजा बना था। मगध भी 16 महाजनपदों में से एक था(16 महाजनपदों का उल्लेख बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय तथा जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में मिलता है) किंतु कालांतर में बिंबिसार ने मगध का विस्तार किया और यह एक महाजनपद से एक साम्राज्य बन गया।

बिंबिसार एक महत्वकांक्षी तथा शक्तिशाली शासक था। उसने वैवाहिक संबंध के माध्यम से अपने साम्राज्य का विस्तार किया। बिंबिसार ने कोशल नरेश प्रसेनजीत की बहन महाकोशला से तथा वैशाली के चेटक की पुत्री चेल्लना से विवाह किया।
बिम्बिसार ने पूर्व में स्थित अंग के राजा ब्रह्मदत्त को हराकर अंग को भी मगध साम्राज्य में मिला लिया।

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बिंबिसार की हत्या करके उसका पुत्र अजातशत्रु शासक बना लेकिन जैन ग्रंथ अजातशत्रु को पितृहंता नहीं बताते हैं। अजातशत्रु जैन धर्म का अनुयायी था। हो सकता है जैन ग्रंथ इसी कारण उसे पितृहंता ना बताते हो। लेकिन अधिकांश विद्वान इस विषय पर एकमत हैं कि सिंहासन प्राप्त करने के लिए अजातशत्रु ने बिंबिसार को कारागार में डाल दिया था।

अजातशत्रु 493 ईसा पूर्व में मगध की राज गद्दी पर बैठा था। अजातशत्रु का अर्थ है जिसका कोई शत्रु न हो। अजातशत्रु का एक अन्य नाम कुणिक भी मिलता है। अजातशत्रु ने भी साम्राज्य विस्तार की नीति अपनाई। अजातशत्रु का कोशल नरेश प्रसेनजीत से युद्ध हुआ किंतु कालांतर में संधि हो गई और कोशल की राजकुमारी वाजिरा के साथ अजातशत्रु का विवाह हुआ।

जैन ग्रंथ भगवती सूत्र के अनुसार वत्सकार (वर्षकार,वरस्कार) अजातशत्रु का योग्य मंत्री था जिसकी सहायता से उसने वज्जि संघ(वैशाली) और लिच्छवियों पर विजय प्राप्त की।

अजातशत्रु के बाद उसका पुत्र उदयभद्र(उदयन) मगध की राजगद्दी पर 461 ई. पूर्व में बैठा। उदयन अजातशत्रु की हत्या करके राजा बना था। उदयन के समय तक काशी, अंग तथा वैशाली मगध साम्राज्य के अंग बन चुके थे। ऐतिहासिक नगर पाटलिपुत्र (पाटिलग्राम) की स्थापना उदयन के समय ही हुई थी।

उदयन की मृत्यु के बाद अल्पकाल के लिए कुछ शासक मगध की राज गद्दी पर बैठे। तत्पश्चात शिशुनाग मगध का सम्राट बना। शिशुनाग के समय अवन्ति भी मगध साम्राज्य का अंग बन गया था। शिशुनाग ने कोशल पर विजय प्राप्त की तथा मगध साम्राज्य का आगे विस्तार किया।

शिशुनाग के बाद कालाशोक राजा बना जो अधिक दिनों तक शासन ना कर सका और उसकी हत्या कर दी गई।

कालाशोक के बाद मगध में एक नए राजवंश का उदय होता है जिसे नंद वंश के नाम से जाना जाता है।
नंद वंश की स्थापना महानंदिन ने की थी।
नंद वंश का प्रथम प्रमुख शासक महापद्मनंद था। वह एक शूद्र दासी पुत्र था। सभी ऐतिहासिक स्त्रोतों से यह तथ्य निश्चित है कि वह एक अत्याचारी,शक्तिशाली और समृद्ध सम्राट था। पुराणों में उसे सर्वक्षत्रान्तक कहा गया है जिसका तात्पर्य है सभी क्षत्रियों का नाश करने वाला। इससे यह स्पष्ट है कि वह शूद्र ही था।

महापदम नंद की मृत्यु के बाद घनानंद शासक बना। घनानंद के समय ही भारत के पश्चिमी सीमावर्ती छोटे राज्यों पर सिकंदर का आक्रमण हुआ था। घनानंद के के पास एक शक्तिशाली सेना थी। माना जाता है कि नंद वंश की शक्तिशाली सेना से डरकर ही सिकंदर के सैनिकों ने व्यास नदी को पार करने से मना कर दिया था।

कालांतर में चंद्रगुप्त मौर्य ने घनानंद को मारकर मगध में मौर्य वंश की स्थापना की। चंद्रगुप्त मगध की राज गद्दी पर 322 ईसा पूर्व में बैठा।

घनानंद को हराने में चाणक्य ने चंद्रगुप्त का साथ दिया था।
पहले चाणक्य घनानंद के दरबार में ही रहता था। किंतु घनानंद ने चाणक्य का अपमान किया था जिसके कारण चाणक्य ने नंद वंश का विनाश करने का निश्चय किया। चाणक्य कालांतर में चंद्र गुप्त का मुख्य सलाहकार बना और श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ सिद्ध हुआ। चाणक्य ने अर्थशास्त्र नामक पुस्तक लिखी जिसमें राजनीति के बारे में विस्तृत वर्णन मिलता है। चाणक्य के अन्य नाम विष्णुगुप्त तथा कौटिल्य है।

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