विश्वविद्यालयों में पढ़ाई या लड़ाई

JNU के हालिया घटनाक्रम को देखकर लगता है कि विश्वविद्यालय अब पढ़ाई नहीं बल्कि लड़ाई और राजनीति के अड्डे बन चुके हैं। विद्रोह और गुंडागर्दी करके अपनी देशभक्ति प्रदर्शित की जा रही है।लगता है देश की विपक्षी पार्टी कमजोर हो चुकी है इसलिए जेएनयू के वामपंथी छात्रों ने यह जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली है। वास्तव में यह छात्र आंदोलन नहीं बल्कि एक राजनीतिक विद्रोह है।राजनीति की आड़ में गरीब और लोकतंत्र की बात की जा रही है लेकिन इन लोकतंत्र के महान समर्थकों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि जो गरीब छात्र देश के विभिन्न कोने से यहां पर पढ़ने आए हैं उनके लिए यह लोग रुकावट उत्पन्न कर रहे हैं। मुट्ठी भर लोग विश्वविद्यालय के पूरे छात्रों के आंदोलन के प्रतिनिधि बनने का प्रयास कर रहे हैं। विश्वविद्यालय का एक सामान्य पढ़ने वाला छात्र इन आंदोलनों से दूर ही रहना चाहता है।आंदोलनकारी तो कुछ राजनीतिक मनोवृति वाले लोग हैं जो राजनीति में प्रवेश करने के लिए मौके की तलाश में रहते हैं। यह उन्हें उपयुक्त मौका दिखाई दे रहा है और वे अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में लगे हुए हैं।

जो लोग इसे छात्रों का धरना कह रहे हैं उन्हें ध्यान देना चाहिए कि हर विश्वविद्यालय में छात्र कुछ ना कुछ राजनीतिक विचारधारा वाले होते हैं। और यह विचारधारा दिन-प्रतिदिन अत्यधिक कट्टर होती जा रही है। वे यह समझना नहीं चाहते हैं कि क्या सही है क्या गलत। ऐसे आंदोलन अपनी राजनीतिक विचारधारा को आगे बढ़ाने का कार्य है इन आंदोलनों का छात्र हितों से कोई लेना देना नहीं है। यह लोग इतने दुस्साहसी और कट्टर हो गए हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन से भी झगड़ा करने को तैयार हैं जो कि एक सामान्य छात्र कभी नहीं कर सकता है। केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाले लोगों से ही ऐसी आशा की जा सकती है। अधिकांश आंदोलन अपने स्वार्थ और वैचारिक कट्टरता के कारण ही होता है।एक सामान्य छात्र कभी नहीं चाहेगा कि इस आंदोलन में उसका पैर टूट जाए और उसकी पढ़ाई बर्बाद हो।

अगर सत्य में यह छात्र आंदोलन है तो इन्हें इस बात पर आंदोलन करना चाहिए कि किस तरह विश्वविद्यालय में प्रोफेसरों की नियुक्ति पारदर्शी तरीके से हो।जैसा कि हम जानते हैं आज भी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की नियुक्ति का तरीका पारदर्शी नहीं है। केवल साक्षात्कार के माध्यम से नियुक्तियां की जाती हैं और साक्षात्कार में क्या होता है यह सबको पता है। इस प्रक्रिया में कोई लिखित परीक्षा आयोजित नहीं की जाती और इस तरह भ्रष्टाचार का बोलबाला रहता है।इन आंदोलनकारियों को चाहिए कि इन बातों पर धरना प्रदर्शन करें ताकि इनके धरने में मैं भी शामिल हो सकूं। लेकिन इन्हें तो सियासत से मतलब है सुधार से इनका कुछ लेना देना नहीं है क्योंकि इनके पास मोटी रकम पहले से ही मौजूद है और उसका प्रयोग करके यह कहीं भी अपने आप को सेट कर सकते हैं।

विश्वविद्यालयों को गुटबाजी और सियासत का अखाड़ा बनाना उचित नहीं है क्योंकि ऐसी घटनाओं से हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों की छवि धूमिल हो रही है। आज जेएनयू का नाम लेने से ऐसा लगता है जैसे यह एक अराजक विश्वविद्यालय का पर्याय बन गया हो। शुल्क वृद्धि विरोध से आंदोलन की शुरुआत हुई थी लेकिन शीघ्र ही इसने राजनीतिक रूप ले लिया जिसे विपक्ष के नेताओं ने भी हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।जेएनयू के अधिकांश छात्र ऐसे हैं जो इंटरमीडिएट तक अंग्रेजी माध्यम से पढ़े होते हैं। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ते समय यह अमीर रहते हैं लेकिन जेएनयू में प्रवेश लेते समय वे गरीब हो जाते हैं।जिस छात्र के हॉस्टल के खाने के खर्च का वहन उसके माता-पिता कर सकते हैं उसे गरीब कहना गरीबों का अपमान है। क्योंकि हम लोगों की स्थिति ऐसी थी कि हम इस खर्च को भी वहन कर पाने में असमर्थ थे और विश्वविद्यालय में रहकर पढ़ाई करना हमारे लिए एकदम असंभव था।कुछ ऐसे छात्रों को जानता हूं जिनका घर विश्वविद्यालय से अत्यधिक दूर होने के कारण विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के बाद भी उन्हें विश्वविद्यालय छोड़ना पड़ा क्योंकि वह असली गरीब थे जेएनयू वाले नकली गरीब नहीं। फीस वृद्धि के विरुद्ध जेएनयू वालों का आंदोलन मुझे उस दृश्य की याद दिलाता है जब मेरा पड़ोसी अपने बच्चे के पब्लिक स्कूल के प्रति महीने ₹3000 फीस को तो जमा कर देता है लेकिन ₹300 की बिजली चोरी करने के लिए कटिया मारी में लिप्त रहता है।

जब मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक द्वितीय वर्ष का छात्र था तो उस समय भी कुछ छात्रों ने शुल्क वृद्धि के विरुद्ध आंदोलन किया था किंतु यह जेएनयू जैसा व्यापक और हिंसक नहीं था । मैंने देखा कि उस भीड़ में आगे एक वही छात्र था जो हमारे फैकल्टी का था और रोज कम से कम 4 सिगरेट फूंका करता था।तभी से मैं ऐसे आंदोलनों के रहस्य को अच्छी तरह समझने लगा। ऐसे आंदोलनों में बात पैसे की नहीं होती क्योंकि छात्रों को पता है कि जितनी शुल्क वृद्धि हुई है उसके सापेक्ष में वे कई गुना प्रतिदिन खर्च कर देते हैं। बात होती है घमंड, राजनीति और हुड़दंग की। विश्वविद्यालयों में कई तरह के छात्र आते हैं और सब का उद्देश्य अच्छी तरह पढ़ाई करके पढ़ाई के क्षेत्र में आगे जाना ही नहीं होता है। विश्वविद्यालयों में कुछ लोग गुटबाजी और राजनीति के लिए ही प्रवेश लेते हैं और मौका मिलने पर ऐसे अवसरों से पीछे नहीं हटते हैं जैसा कि हम जेएनयू में इस समय देख रहे हैं। जेएनयू का आंदोलन इस समय छात्र राजनीति ना होकर सरकार का विरोध हो गया है यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।सरकार का विरोध करते-करते यह लोग देश का विरोध करने लगे हैं इन लोगों को कुछ समझ में नहीं आ रहा है। सरकार का विरोध करते करते ये कश्मीर को भी अपने आंदोलन में खींच लाए और दुनिया मे अपने देश को ही नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

दूसरे विश्वविद्यालय जो अब तक शांत पड़े थे जिनमें शांति से पठन-पाठन का कार्य चल रहा था वे भी अब जेएनयू से प्रेरित होकर उबाल मार रहे हैं। यहां के भी कुछ छात्र छात्राओं को लग रहा है कि अब हम भी विरोध प्रदर्शन करें नहीं तो शरीर में जंग लग जाएगी। दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी तथा बी एच यू और न जाने कितने। जो अब तक निष्क्रिय थे उनके भी गुट बनते जा रहे हैं। छात्र और प्रोफ़ेसर, लेफ्ट तथा राइट में बंटते जा रहे हैं। लगता है विरोधियों की कट्टरता समर्थकों को भी कट्टर बनाती जा रही है। जो भी हो जिसको पढ़ना है वह पढ़ाई कर रहा है तथा जिसको लड़ना है वह लड़ाई कर रहा है। लेकिन लड़ाई करने वाले कुछ लोग चाह रहे हैं कि पढ़ाई छोड़कर सब लोग लड़ाई में उतर जाए।