कलिंग की राजधानी क्या थी ?

 कलिंग  की राजधानी तोसली थी . कलिंग का युद्ध मौर्य सम्राट अशोक और कलिंग राज्य के बीच 261 ई. पूर्व.में  हुआ था। अशोक के समय भारत के पूर्वी तट पर स्थित कलिंग एक स्वतंत्र राज्य था जिसमें वर्तमान का उड़ीसा और आंध्र प्रदेश का उत्तरी हिस्सा आता है।

कलिंग की स्थिति सामरिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण थी। जल और स्थल दोनों मार्गों से दक्षिण भारत जाने वाले रास्तों पर कलिंग का नियंत्रण था। कलिंग को जीतने के बाद समुद्री मार्ग से दक्षिण पूर्वी देशों से भी संपर्क साधने में आसानी थी।

अशोक ने कलिंग का युद्ध जितने के बाद कलिंग  की राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया| यह इतिहास का पहला और अंतिम युद्ध था जिसमें विजयी होने के बाद भी विजेता ने आगे राज्यों को ना जीतने और युद्ध ना लड़ने का संकल्प लिया।यह युद्ध इतिहास के सबसे घातक युद्ध में से एक था।

कलिंग के  युद्ध के परिणामों को देखने के बाद एक महान विजेता सम्राट से सन्यासी बन जाता है। इस युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने भेरीघोष के स्थान पर धम्ममघोष का ऐलान किया। इस युद्ध में अत्यधिक रक्तपात के दृश्य से आहत होकर सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। कलिंग युद्ध का कारण अशोक की बढ़ती महत्वाकांक्षा थी.

प्राचीन काल के युद्धों में यह पहला ऐसा युद्ध था जिसमें तिथि की सटीकता भी अत्यधिक स्पष्ट है। कलिंग युद्ध का उल्लेख अशोक के 13वें शिलालेख में है. अशोक के राज्याभिषेक के 8वें वर्ष कलिंग युद्ध लड़ा गया। अशोक का राज्याभिषेक 269 ईसा पूर्व में हुआ था इस अनुसार इस युद्ध की तिथि 261 ईसा पूर्व है।

मौर्य वंश के शक्तिशाली शासकों में गिने जाने वाले सम्राट अशोक एक महत्वाकांक्षी शासक थे। राज्याभिषेक के बाद उसने अपने राज्य का काफी विस्तार किया। कलिंग का युद्ध अशोक द्वारा लड़ा गया पहला प्रमुख युद्ध था।

अशोक द्वारा कलिंग पर आक्रमण करने के राजनीतिक और आर्थिक दोनों कारण थे। कलिंग एक संपन्न राज्य था। कलिंग के पास महत्वपूर्ण बंदरगाह थे तथा उनकी नौसेना अत्यधिक शक्तिशाली थी। कलिंग का दक्षिण पूर्व के समुद्री देशों से अच्छा व्यापार होता था। बंगाल की खाड़ी में व्यापार के लिए तटीय क्षेत्रों पर कलिंग का पूरा अधिकार था।

चंद्रगुप्त मौर्य ने कलिंग को पहले ही जीतने का प्रयास किया था लेकिन कलिंग के कड़े प्रतिरोध ने उसको पीछे हटने पर विवश कर दिया। जैसे ही अशोक को लगा कि वह सुरक्षित रूप से सिंहासन पर आसीन हो गया है उसने नए स्वतंत्र साम्राज्य को जीतने के लिए स्वयं को तैयार किया।

कलिंग मौर्य साम्राज्य के लिए एक रणनीतिक खतरा था। यह राजधानी पाटलिपुत्र तथा मौर्यों द्वारा जीते गए दक्षिण भारत के राज्यों के बीच संपर्क को बाधित कर सकता था। बंगाल की खाड़ी में पूर्वी भारत के तटीय क्षेत्रों पर कलिंग का विशेष प्रभाव था। अपनी इन्हीं चिंताओं को दूर करने के लिए अशोक ने कलिंग राज्य पर आक्रमण किया।

भारतीय इतिहास में इतने भीषण रक्तपात के लिए कोई युद्ध कुख्यात नहीं है जितना कि अशोक द्वारा लड़ा गया कलिंग का युद्ध। मानव इतिहास में कोई ऐसा युद्ध नहीं हुआ है जिसने एक क्रूर विश्व विजयी सम्राट को हृदय परिवर्तन के लिए बाध्य कर दिया हो।कलिंग के भीषण युद्ध के बाद भारत में कुछ समय के लिए शांति छा जाती है।

अशोक ने भयानक रक्तपात को देखा और उसे महसूस हुआ कि इन सब विध्वंस का कारण वह स्वयं है। कलिंग के पूरे क्षेत्र को लूटा गया और उसे जला दिया गया। अशोक के शिलालेखों में उल्लेख किया गया है कि कलिंग की ओर से लगभग एक लाख लोग इस युद्ध में मारे गए तथा अशोक की सेना की ओर से भी लगभग इतनी ही संख्या में लोग मारे गए। कलिंग से हजारों लोगों को बंदी बनाकर भी ले जाया गया।

अपने पिता की मृत्यु के बाद हुए खूनी संघर्ष के परिणाम स्वरुप अशोक ने राजगद्दी प्राप्त करने में सफलता पाई थी और इसके बाद वह कलिंग को जीतने में भी सफल रहा लेकिन इन बर्बरता के परिणामों ने युद्ध पर उसके विचार को बदल दिया और उसने आगे साम्राज्य विस्तार के लिए युद्ध न करने का संकल्प लिया।

अशोक के 13वें शिलालेख में लिखा हुआ है-

“देवों के प्रिय, राजा प्रियदर्शी ने अपने राज्याभिषेक के आठवें वर्ष कलिंग को जीत लिया। युद्ध में 100000 लोग मारे गए और बहुत से अन्य कारणों (घायल होने आदि) के कारण मर गए। कलिंग युद्ध को जीतने के बाद देवों के प्रिय का धर्म की ओर गहरा झुकाव हुआ। कलिंग को जीतने के बाद अब देवों के प्रिय को गहरा पश्चाताप हो रहा है।”

कलिंग युद्ध के बारे में अशोक के विचार उसके शिलालेखों में वर्णित किए गए हैं। कलिंग युद्ध ने अशोक को अहिंसा और धर्म के लिए अपने जीवन को समर्पित करने के लिए प्रेरित किया और अशोक ने कई घोसणाए(declaration) की.। इस युद्ध के बाद अशोक ने साम्राज्य विस्तार की नीति को त्याग दिया और अगले 40 वर्षों के लिए शांति, सद्भाव और संपन्नता के युग का प्रारंभ हुआ।

इस युद्ध के परिणाम से व्यथित होकर अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया तथा अहिंसा की नीति अपनाई। उसने दूसरे देशों से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाना प्रारंभ कर दिया तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए प्रचारकों को सुदूर देशों तक भेजा।स्वयं अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र तथा पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका भेजा। उसने अपने राज्य के संसाधन प्रजा की भलाई में लगाएं तथा पशुओं के लिए भी चिकित्सालय का निर्माण करवाया। उसने सत्य, प्रेम, दया, दान आदि के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया। उसने बौद्ध भिक्षुओं के लिए कई मठों और विहारों का निर्माण करवाया। उसने अपने अभिलेखों के माध्यम से शांति और अहिंसा का संदेश दिया।

कलिंग युद्ध मौर्य वंश के पतन का कारण बना. कहा जाता है कि व्यक्ति की अत्यधिक सज्जनता उसके पतन का कारण बनती है। अशोक के साथ भी यही हुआ। इस  युद्ध के पश्चात अहिंसा का मार्ग अपनाने के कारण उसने सैनिकों पर ध्यान देना बंद कर दिया परिणाम स्वरूप राज्य की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होने लगी और अशोक के मृत्यु के 50 वर्ष के अंदर ही महान मौर्य साम्राज्य का पतन हो गया। मौर्य साम्राज्य के पतन में मौर्यों द्वारा बौद्ध धर्म को अपनाया जाना एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।

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