खानवा का युद्ध कब हुआ था ?

खानवा का युद्ध वर्तमान राजस्थान के भरतपुर जनपद में स्थित खानवा नामक गांव में 16 मार्च 1527 को  मुगल सम्राट बाबर और मेवाड़ के राजपूत शासक राणा सांगा के बीच लड़ा गया। इस युद्ध में अफ़गानों और कुछ राजपूत राजाओं ने भी राणा सांगा का साथ दिया। 1526 से 1530 के बीच बाबर द्वारा भारत में लड़े गए युद्धों में यह युद्ध सबसे भयानक था। मुगलों ने  खानवा का युद्ध जीता  तथा राना सांगा  की हर हुई.

 युद्ध की पृष्ठभूमि

1524 तक बाबर का उद्देश्य अपने साम्राज्य को केवल पंजाब तक विस्तृत करना था ताकि वह अपने पूर्वज तैमूर के विरासत को बनाए रखे क्योंकि पंजाब तक का हिस्सा तैमूर के साम्राज्य के अंतर्गत था।

इस समय उत्तर भारत का मुख्य भाग लोदी वंश के शासक इब्राहिम लोदी के नियंत्रण में था लेकिन आंतरिक षड़यंत्रों के कारण उसका साम्राज्य दिन-प्रतिदिन कमजोर हो रहा था। कुछ विद्रोही इब्राहिम लोदी को गद्दी से हटाना चाहते थे।

इसी क्रम में पंजाब के गवर्नर दौलत खां लोदी और इब्राहिम लोदी के चाचा अलाउद्दीन ने बाबर को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। बाबर के आक्रमण का समाचार पाकर राणा सांगा ने भी अपने दूत को काबुल भेजा और इब्राहिम लोदी के विरुद्ध बाबर का साथ देने का प्रस्ताव दिया।राणा सांगा ने बाबर से कहा कि जब वह दिल्ली पर आक्रमण करेगा उसी समय राणा सांगा आगरा पर धावा बोलेगा।

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लेकिन बाद में विचार करने के पश्चात राणा सांगा ने आगरा पर आक्रमण करने के अपने विचार को त्याग दिया। उसे लगा कि इस युद्ध में इब्राहिम लोदी के हार के बाद वह आसानी से दिल्ली और आगरा पर कब्जा कर लेगा।

 

पानीपत के प्रथम युद्ध के बाद बाबर ने यह अनुभव किया कि उसे राणा सांगा और पूर्व में शासन कर रहे अफ़गानों से खतरा है। बाबर ने एक सभा बुलाई जिसमें यह निर्णय लिया गया कि अफगान एक बड़ा खतरा है अतः पूर्व में अफगानों का दमन करने के लिए हुमायूं को भेजा गया। लेकिन राणा सांगा के आगरा की ओर बढ़ने के समाचार को प्राप्त करने के बाद हुमायूं को तुरंत वापस बुला लिया गया। आगरा के सीमावर्ती मजबूत किलों धौलपुर, ग्वालियर और बयाना को जीतने के लिए हुमायूं के नेतृत्व में सैनिक टुकड़िया भेजी गई। धौलपुर और ग्वालियर के किलेदारों ने समर्पण कर लिया। बयाना भेजी गई मुगलों की सैन्य टुकड़ी को राणा सांगा ने हरा दिया।

खानवा के युद्ध के कारण

  • बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को मार डाला लेकिन इस युद्ध में राणा सांगा ने उसका साथ नहीं दिया। इस कारण बाबर राणा सांगा पर क्रोधित हो गया।
  • राणा सांगा को लगा कि इब्राहिम लोदी को हराने के बाद दिल्ली का खजाना लूटकर बाबर वापस काबुल चला जाएगा लेकिन बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध के बाद भारत में मुगल वंश की स्थापना की और दिल्ली में रुक गया।
  • राणा सांगा एक शक्तिशाली राजपूत शासक था जिसे पराजित किए बिना दिल्ली पर आसानी से शासन करना सुरक्षित नहीं था।
  • अफ़गानों ने राणा सांगा को समर्थन देकर बाबर के विरुद्ध उसको प्रोत्साहित किया।
  • राणा सांगा मुगलों के लिए एक खतरा था।
  • इतिहासकारों का मानना है कि बाबर और राणा सांगा दोनों की बढ़ती महत्वाकांक्षा इस युद्ध का कारण था।
  • राणा सांगा तुर्को ं और अफगानों के खंडहरों पर हिंदू राज्य की स्थापना करना चाहता था।

बाबर के विरुद्ध राजपूतों और अफ़गानों का संगठन

राणा सांगा इस खानवा के  युद्ध में बाबर के विरुद्ध राजपूतों और अफ़गानों का एक बड़ा सैन्य संगठन बनाने में सफल रहा। राजस्थान के प्रमुख राजपूत राजाओं ने राणा सांगा का साथ दिया जिनमें हाड़ोती, जालौर, सिरोही और डूंगरपुर के राजा शामिल थे। मारवाड़ का राव गंगा व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हुआ लेकिन उसने अपने पुत्र मालदेव राठौर के नेतृत्व में सेना की एक टुकड़ी भेजी। चंदेरी का मेदिनी राय भी इस संगठन से जुड़ा।

आगे सिकंदर लोदी का भाई महमूद लोदी जिसे अफ़गानों ने अपना नया सुल्तान घोषित कर दिया था अपने 10000 अफगान सैनिकों के साथ इस गठबंधन का हिस्सा बना। मेवात का शासक हसन खान मेवाती ने भी अपने 12000 सैनिकों के साथ अफगान-राजपूत संगठन का साथ दिया।बाबर के विरुद्ध राणा सांगा का साथ देने वाले अफगानों को बाबर ने ‘काफिरों’ की संज्ञा दी।

पुरबिया राजपूत सिलहदी (शिलादित्य) बीच युद्ध में ही अपने 35000 सैनिकों के साथ राणा सांगा को छोड़कर बाबर से जा मिला।

खानवा का युद्ध

बाबर के अनुसार राणा सांगा की सेना में दो लाख सैनिक थे। लेकिन यह संख्या सही नहीं है फिर भी इतिहासकारों में इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि राणा सांगा की सेना बाबर से बड़ी थी।

राजपूतों के साहस और उनकी बड़ी संख्या ने बाबर के सैनिकों में भय व्याप्त कर दिया।बाबर ने अपने सैनिकों के गिरते मनोबल को उठाने के लिए इस युद्ध को हिंदुओं के विरुद्ध एक धार्मिक रंग दे दिया। उसने इसे धार्मिक जिहाद की संज्ञा दी। उसने शराब की बोतलें तुड़वा दी और शराब के संग्रह को जमीन पर गिरा दिया। उसने अपने सैनिकों को त्याग का पाठ पढ़ाया और विलासिता से दूर रहने की शिक्षा दी।

बाबर अपनी आत्मकथा तुजुक -ए -बाबरी  में लिखता है कि यह एक अच्छा विचार था और इसका मित्रों तथा शत्रुओं दोनों पर एक अनुकूल प्रभाव पड़ा।

16 मार्च 1527 को फतेहपुर सीकरी के निकट खानवा नामक स्थान पर दोनों की सेनाएं आमने सामने खड़ी थी। बाबर ने पहले ही इस युद्ध क्षेत्र का सावधानी से निरीक्षण कर लिया था। पानीपत के प्रथम युद्ध की तरह ही इस युद्ध में भी बाबर ने तुलगमा और अराबा रणनीति का प्रयोग किया। दूसरी तरफ इस युद्ध में राणा सांगा ने परंपरागत युद्ध नीति का प्रयोग करते हुए बाबर के सैनिकों पर आक्रमण किया। दोनों के बीच भयानक युद्ध होने लगा। राजपूतों ने इस युद्ध में इतना साहस दिखाया कि मुगलों के अंदर निराशा छाने लगी।

कई घंटों तक युद्ध होने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं दिख रहा था कि युद्ध कौन जीत रहा है। अंत में बाबर ने अपने सैनिकों को जिहाद के नाम पर प्रेरित किया और मुगल सैनिक दुगने उत्साह से लड़ने लगे।

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इस प्रकार साहसपूर्ण युद्ध लड़ने के बाद भी राणा सांगा और उसके सहयोगियों को खानवा के  युद्ध में हार मिली। राणा सांगा इस युद्ध से जीवित बच निकला और चित्तौड़ पहुंच गया। महमूद लोदी ने भागकर गुजरात में शरण ली।

खानवा की लड़ाई  में विजय के बाद बाबर ने अपने पूर्वज तैमूर की परंपरा को जारी रखते हुए विरोधियों के कटे हुए मस्तकों की मीनार बनवाई। शत्रुओं के मस्तकों का मीनार बनवाना केवल अपने महान विजय को दर्शाना नहीं बल्कि विरोधियों के अंदर दहशत पैदा करना भी था।

युद्ध का परिणाम

खानवा का युद्ध बाबर के लिए पानीपत के युद्ध से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था क्योंकि उसने तत्कालीन भारत के सबसे शक्तिशाली राजा को हराया था। इस युद्ध में विजय के पश्चात बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की।

खानवा की लड़ाई ने यह सिद्ध कर दिया कि युद्ध जीतने के लिए केवल बहादुरी ही पर्याप्त नहीं है बल्कि एक कुशल सैन्य नेतृत्व और संगठनात्मक कौशल भी होना चाहिए जो बाबर में पर्याप्त मात्रा में उपस्थित था।

बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में लिखा कि संभवतः हिंदुस्तानी अच्छे तलवारबाज हैं। वे मरना और मारना तो जानते हैं लेकिन सैन्य रणनीति और संगठनात्मक क्रियाकलापों में वे अज्ञानी और अकुशल हैं।

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खानवा के  युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद भी बाबर के शत्रुओं की संख्या कम नहीं हुई। उसे अपनी मृत्यु तक लगातार शत्रुओं से संघर्ष करना पड़ा। अफगान मुगलों के लिए लगातार एक खतरा बने रहे।

इस युद्ध में पराजय के बाद मेवाड़ की शक्ति और शान भारतीय राजनीति में अब एक प्रभावशाली बिंदु नहीं रहा। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यदि बाबर के पास तोप नहीं रहते तो वह इस युद्ध में कभी विजय प्राप्त न कर पाता।

खानवा के युद्ध में पराजय के बाद राणा सांगा बाबर से पुनः युद्ध करने की योजना बना रहा था लेकिन उसके इस योजना को आत्मघाती मानते हुए उसके ही किसी सरदार ने उसे जहर दे दिया और 30 जनवरी 1528 को चित्तौड़ में राणा सांगा की मृत्यु हो गई।

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