खिलजी वंश का संस्थापक कौन था?

खिलजी वंश का संस्थापक जलालुद्दीन फिरोज खिलजी था. खिलजी वंश  की स्थापना जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने 1290 ई. में की। इस वंश के शासकों ने भारतीय उपमहाद्वीप में 1290 से 1320 ई. तक शासन किया। खिलजी वंश अपनी क्रूरता, दक्षिण भारत के हिंदू राज्यों पर आक्रमण, अपनी साम्राज्य विस्तार की नीति, और मंगोल आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए जाना जाता है .  

खिलजी कौन थे?

खिलजियों के मूल स्थान और जाति के विषय में पर्याप्त विवाद है। भारत आने से पूर्व यह जाति अफगानिस्तान के हेलमंद नदी के तटीय क्षेत्रों के उन भागों में रहती थी जिसे खिलजी के नाम से जाना जाता था। हो सकता है इसी कारण इस जाति को खिलजी कहा गया। इतिहासकार बरनी ने इन्हें तुर्कों से अलग जबकि फखरुद्दीन ने खिलजियों को तुर्कों की ही कई जातियों में से एक माना है। फखरुद्दीन के मत को अधिकांश विद्वानों का समर्थन मिलता है। खिलजी जनसाधारण वर्ग से आते थे। इनके हाथ में सत्ता आने से यह धारणा भी कमजोर हुई कि सत्ता पर केवल विशिष्ट वर्ग का ही अधिकार है।

 

इस वंश के प्रमुख शासकों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है-

जलालुद्दीन फिरोज खिलजी

जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने खिलजी वंश की स्थापना की। उसका असली नाम मलिक फिरोज था। वह गयासुद्दीन बलबन के शासनकाल में एक सामंत था। बलबन की मृत्यु के बाद तुर्क सरदारों के बीच गुटबाजी और संघर्ष बढ़ने लगा जिसका फायदा उठाकर जलालुद्दीन फिरोज खिलजी गुलाम वंश के अंतिम शासक समसुद्दीन क्यूमर्स की हत्या करके स्वयं सुल्तान बन गया।

 

वह गद्दी पर आसीन होने के समय 70 वर्ष का था। जलालुद्दीन ने तुर्क सरदारों के विरोध का सफलतापूर्वक दमन किया और जनवरी 1290 में सिंहासन पर आसीन हुआ। तुर्क सरदारों को वह पूर्ण रूप से स्वीकार्य नहीं था। उसने एक साल तक दिल्ली में प्रवेश नहीं किया और दिल्ली के निकट किलोखरी से अपना शासन चलाता रहा। उसके 6 वर्षों के शासनकाल के दौरान बलबन के कई विश्वासपात्र विरोध करते रहे। जलालुद्दीन ने इन विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन किया और कई विद्रोहियों की हत्या करवा दी। रणथंभौर के विरुद्ध उसका अभियान असफल रहा। उसने अपने भतीजे जूना खान की मदद से सिंध नदी के किनारे मंगोलो को परास्त किया। जब दोबारा मंगोलो ने उलूग खान के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया तो सुल्तान और मंगोलो के बीच समझौता हो गया। सुल्तान ने अपनी पुत्री का विवाह उलूग खान से करवा दिया और कुछ मंगोल दिल्ली के निकट बस गए जिन्हें नवीन मुस्लमान कहा गया .

अलाउद्दीन खिलजी

अलाउद्दीन का नाम केवल खिलजी वंश में नहीं बल्कि पूरी सल्तनत में सबसे क्रूर और महत्वाकांक्षी शासक के रूप में आता है। उसका असली नाम अली गुरशप्प था। सुल्तान बनने से पहले वह कड़ामानिकपुर का सूबेदार था। बलबन के भतीजे मलिक छज्जू के विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन करने के कारण ही जलालुद्दीन ने उसे कड़ामानिकपुर का सूबेदार बनाया था। वह जलालुद्दीन का भतीजा और दामाद था।सुल्तान बनने से पहले ही उसने अपने दक्षिण भारत के अभियान में देवगिरी को लूटा था।जलालुद्दीन से गले मिलते समय उसने धोखे से उसकी हत्या कड़ा (इलाहाबाद) में कर दिया और स्वयं सुलतान बन गया। उसने अपने विद्रोहियों का बर्बरता पूर्वक दमन किया। जिस व्यक्ति से भी उसे खतरा महसूस होता था परिवार सहित वह उसकी हत्या करवा देता था।

वह दिल्ली सल्तनत का पहला शासक था जिसने दक्षिण भारत में अभियान चलाया। उसने रणथंभौर(1301ई.), चित्तौड़(1303), मांडू(1305) और समृद्ध राज्य देवगिरी पर आक्रमण करके अपार धन-संपत्ति लूटा तथा उनसे अपनी अधीनता स्वीकार करवाई।जीते हुए राज्यों के प्रति अपनी क्रूरता के लिए वह कुख्यात है। इतिहासकार उसे एक अत्याचारी शासक मानते हैं। विद्रोह की आशंका के कारण हाल ही में इस्लाम धर्म ग्रहण कर दिल्ली में रहने वाले लगभग 30,000 मंगोलो का उसने कत्लेआम करवा दिया।विद्रोह का विचार करने वाले अपने कुछ परिवार वालों का भी उसने सिर कटवा दिया और उनकी आंखें निकलवा ली।

अलाउद्दीन के सेनानायक मलिक काफूर ने 1310 ई. में काकातीय राजाओं की राजधानी वारंगल पर अधिकार कर लिया। वहां के तत्कालीन राजा प्रताप रुद्रदेव ने अपनी जान बचाने के लिए मलिक काफूर को बहुत ज्यादा सोना चांदी अर्पित किया। माना जाता है कि इसी समय उसने कोहिनूर हीरा भी मलिक काफूर को दे दिया। उसने होयसल साम्राज्य की राजधानी द्वारसमुद्र (1311) पर भी आक्रमण किया तथा मदुरै पर भी धावा बोला। अपने इन अभियानों में उसने दक्षिण भारत के कई मंदिरों को भी लूटा। वह युद्ध में लुटे हुए खजाने के साथ 1311 में दिल्ली पहुंचा। अपने इन सफल अभियानों के कारण मलिक काफूर अलाउद्दीन खिलजी का चहेता बन गया।

अलाउद्दीन खिलजी अपने द्वारा किए गए प्रशासनिक तथा सैनिक सुधारों के कारण भी जाना जाता है। उसने बाजार में मूल्य नियंत्रण की प्रणाली को अपनाया। सभी वस्तुओं का मूल्य निश्चित कर दिया गया।बाजार में वस्तुओं का मूल्य निश्चित करने के कारण कम वेतन देकर एक बड़ी सेना रखने में उसे सहायता मिली। लेकिन उसकी इस व्यवस्था के कारण किसान बर्बाद हो गए। उन्हें अपनी मेहनत का उचित दाम नहीं मिल पाता था।

उसने एक बड़ी और स्थाई सेना का गठन किया जिसमें लगभग पांच लाख सैनिक थे।उसने सैनिकों का हुलिया लिखने तथा घोड़ों को दागने की प्रथा प्रारंभ करवाई ताकि शत्रु उसे धोखा ना दे सके।

दिसंबर 1315 में बीमारी के कारण अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई। माना जाता है कि बीमारी के कारण उसे अत्यधिक कष्ट हो रहा था अतः उसने मलिक काफूर से अपनी हत्या कर देने को कहा।

मलिक काफूर

मलिक काफूर एक नपुंसक (eunuch) और शारीरिक सौंदर्य का धनी था। वह अलाउद्दीन का एक गुलाम था जो अपनी योग्यता के बल पर उसका प्रमुख सेनानायक बना। अलाउद्दीन के सेनानायक नुसरत खान द्वारा 1299 के गुजरात अभियान में उसे खंभात (बंदरगाह नगर) से पकड़ा गया था।मलिक काफूर ने दक्षिण भारत से अपार मात्रा में घोड़े, हाथी और सोना- चांदी लूट कर अलाउद्दीन खिलजी के चरणों में समर्पित कर दिया। उसने सेनानायक के रूप में 1306 में मंगोल आक्रमण का भी सफलतापूर्वक सामना किया। अलाउद्दीन उस पर बहुत विश्वास करता था।अलाउद्दीन ने उसे 1313 में देवगिरी का गवर्नर भी नियुक्त कर दिया था। 1315 में अपनी बीमारी के समय अलाउद्दीन ने उसे वापस दिल्ली बुला लिया और उसे नायब के रूप में रखा गया। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद उसने सत्ता पर कब्जा करना चाहा लेकिन उसकी हत्या कर दी गई।

खिलजी वंश के अंतिम सुल्तान

अलाउद्दीन खिलजी के बाद उत्तराधिकार के संघर्ष में कई हत्याएं हुई। अलाउद्दीन के बाद सबसे ज्यादा ताकतवर मलिक काफूर था अतः वह गद्दी पर बैठा लेकिन उसे अमीरों से सहयोग प्राप्त नहीं था और कुछ महीनों के अंदर ही उसकी हत्या हो गई।

मलिक काफूर की मृत्यु के बाद दरबारी सरदारों ने 6 वर्षीय शहाबुद्दीन उमर को सुल्तान और उसके बड़े भाई कुतुबुद्दीन मुबारक शाह को उसका संरक्षक नियुक्त किया। कुछ समय बाद मुबारक शाह ने अपने छोटे भाई की हत्या कर दी और स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया। दरबारी अमीरों का विश्वास जीतने के लिए मुबारक शाह ने गाजी मलिक को पंजाब का सैनिक कमांडर नियुक्त किया। 1320 में मुबारक शाह के एक सेनानायक खुसरो खान ने उसकी हत्या कर दी। अमीरों ने पंजाब के सैनिक कमांडर गाजी मलिक को तख्तापलट के लिए आमंत्रित किया। गाजी मलिक की सेना दिल्ली पहुंची और खुसरो खान को पकड़ कर उसकी हत्या कर दी। यही गाजी मलिक, गयासुद्दीन तुगलक के नाम से गद्दी पर बैठा जिसने 1320 ई. में तुगलक वंश की स्थापना की।

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