मौर्य वंश का इतिहास

मौर्य वंश प्राचीन भारत का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था जिसने एक अखंड भारत का निर्माण किया और एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की .

मौर्य वंश का संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य था जिसने चाणक्य के साथ मिलकर घनानंद को हराया और पाटलिपुत्र में मौर्य वंश की नींव डाली। नंद वंश के विरुद्ध युद्ध में चंद्रगुप्त मौर्य ने कश्मीर के राजा पर्वतक से सहायता प्राप्त की थी.

चंद्रगुप्त 322 ईसा पूर्व में राजगद्दी पर बैठा। चंद्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का अनुयाई था। उसने जैन गुरु भद्रबाहु से जैन धर्म की शिक्षा ली थी।

मौर्य वंश की राजधानी पाटलिपुत्र थी. पाटलिपुत्र की स्थापना हर्यक वंश के शासक उदयन ने किया था. मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका में चन्द्रगुप्त के समय में पाटलिपुत्र नगर का वर्णन किया है.

विशाखदत्त द्वारा रचित मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त मौर्य के लिए वृषल शब्द का प्रयोग किया गया है।वृषल शब्द का अर्थ निम्न कुल में उत्पन्न होना है। ब्राह्मण ग्रंथों में चंद्रगुप्त को निम्न कुल में उत्पन्न होना बताया गया है जबकि बौद्ध ग्रंथों में उसे उच्च जाति का बताया गया है।

चंद्रगुप्त ने 305 ईसा पूर्व में सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस निकेटर को हराया।सेल्यूकस निकेटर ने अपनी पुत्री कार्नेलिया का विवाह चंद्रगुप्त मौर्य के साथ कर दिया और उसने काबुल, कंधार हेरात तथा मकरान चार प्रांत चंद्रगुप्त को दे दिए। बदले में चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को कई हाथी उपहार में दिए।

चंद्रगुप्त की मृत्यु 298 ईसा पूर्व में कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में उपवास के कारण हुई। वह जैन धर्म का अनुयायी था अतः अपने जीवन काल के अंतिम समय में हुआ राजनीतिक जीवन से संन्यास लेकर एकांतवास के लिए श्रवणबेलगोला चला गया।

चाणक्य चंद्रगुप्त का प्रधानमंत्री था। चाणक्य के अन्य नाम विष्णुगुप्त तथा कौटिल्य भी हैं।कौटिल्य ने अर्थशास्त्र नामक पुस्तक लिखी जिसका संबंध राजनीति से है और इस पुस्तक के माध्यम से हमें मौर्य काल के बारे में जानकारी मिलती है।

मेगस्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था जो चंद्रगुप्त के दरबार में रहता था।उसने इंडिका नामक पुस्तक लिखी जिसके माध्यम से हमें चंद्रगुप्त के समय के बारे में कुछ जानकारियां मिलती हैं। मेगास्थनीज की इंडिका के अनुसार चंद्रगुप्त के खाना खाने से पहले एक खास नौकर उस खाने को चखता था। राजा लगातार दो रात्रि एक ही  कमरे में नहीं सोता था।मेगास्थनीज के अनुसार भारत में 7 जातियां थी।

बिंदुसार चंद्रगुप्त मौर्य का पुत्र था जो 298 ईसा पूर्व में मगध की राज गद्दी पर बैठा। बिंदुसार को अमित्र घात के नाम से जाना जाता था जिसका अर्थ होता है शत्रु विनाशक। वायु पुराण में बिंदुसार को भद्रसार(वारिसार) कहा गया है। जैन ग्रंथों में बिंदुसार को सिंहसेन कहा गया है।

इतिहासकार एथिनियस ने लिखा है कि बिंदुसार ने सीरिया के शासक एंटीओकस प्रथम से मदीरा, सूखे अंजीर और एक दार्शनिक भेजने की प्रार्थना की।एंटीओकास ने कहा कि हम मदिरा और सूखे अंजीर तो भेज सकते हैं लेकिन दार्शनिक भेजने की प्रथा हमारे देश में नहीं है।

बिंदुसार के शासनकाल में तक्षशिला में हुए दो विद्रोहों का वर्णन है। इस विद्रोह को दबाने के लिए बिंदुसार ने पहले सुसीम और बाद में अशोक को भेजा।बौद्ध विद्वान तारानाथ के अनुसार बिंदुसार 16 राज्यों का विजेता था

अशोक 269 ईसा पूर्व में मगध की राजगद्दी पर बैठा। माना जाता है कि 273 ईसा पूर्व में बिंदुसार की मृत्यु के बाद अपने 100 भाइयों की हत्या करने के बाद अशोक राजगद्दी को प्राप्त करने में सफल हुआ। राजगद्दी पर बैठने के समय अशोक अवन्ति का राज्यपाल था।

261 ईसा पूर्व में हुए कलिंग के युद्ध में अत्यधिक रक्तपात को देखने के बाद अशोक का ह्रदय परिवर्तित हो गया और वह एक साम्राज्यवादी से अब सन्यासी बन गया।

कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया। उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने अशोक को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी।

पुराणों में अशोक को अशोकवर्धन कहा गया है। मास्की एवं गुर्जरा अभिलेख में अशोक का नाम अशोक मिलता है।अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी।

भारत में शिलालेख का प्रचलन सर्वप्रथम अशोक ने करवाया। अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मी खरोष्ठी, ग्रीक एवं और आरमाइक लिपि का प्रयोग हुआ है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक ने 84000 स्तूपों का निर्माण करवाया था।

ब्राह्मी लिपि के अभिलेख भारत से मिलते हैं जबकि ग्रीक एवं आरमाइक लिपि का अभिलेख अफगानिस्तान में और खरोष्ठी लिपि का अभिलेख उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान से मिलता है। भारत में ग्रीक आक्रमण अफगानिस्तान की तरफ हुए थे अतः उस क्षेत्र में ग्रीक लिपि के अभिलेख मिलते हैं।

अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सर्वप्रथम सफलता 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप को मिली।

कौशांबी के अभिलेख को रानी का अभिलेख कहा जाता है। अशोक का सबसे लंबा अभिलेख कौन सा है। सातवां अभिलेख अशोक का सबसे लंबा अभिलेख है। अशोक का सबसे छोटा स्तंभ लेख कौन सा है। अशोक का सबसे छोटा स्तंभलेख रूम्मीदेई का है। इस स्तंभ लेख में लुंबिनी में धर्म यात्रा के दौरान अशोक द्वारा भू राजस्व की दर घटाने का उल्लेख है।

मौर्य काल में सरकारी भूमि को सीता भूमि कहा जाता था। वर्षा के सहारे अच्छी खेती वाली भूमि को देवमातृक कहा जाता था तथा बिना वर्षा के अच्छी खेती वाली भूमि को और अदेवमातृक कहा जाता था।भारत में मौर्य काल में सर्वप्रथम जन्म मरण का लेखा-जोखा रखा गया।

अशोक के समय मौर्य साम्राज्य में प्रांतों की संख्या 5 थी। प्रांत को चक्र नाम से जाना जाता था। प्रांतों के प्रशासक कुमार या आर्य पुत्र कहे जाते थे। मौर्य काल में प्रांतों का विभाजन विषय में किया गया था जो विषयपति के अधीन होता था। मौर्यकाल में प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी जिसका अध्यक्ष ग्रामीक कहलाता था।

मौर्य वंश का अंतिम राजा बृहद्रथ था। बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 150 ईसा पूर्व में कर दी और शुंग वंश की स्थापना की। पुष्यमित्र शुंग एक ब्राह्मण था। मौर्य शासनकाल 137 वर्षों तक रहा।

 

 

 

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