मोहनजोदड़ो का खनन कब हुआ

मोहनजोदड़ो का खनन 1922 में राखलदास बनर्जी ने करवाया मोहनजोदड़ो पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना जिले में सिंधु नदी के किनारे स्थित है। मोहनजोदड़ो का अर्थ है मृतकों का टीला।

हड़प्पा की खोज 1921 में हुई। हड़प्पा सिंधु कालीन सभ्यता का एक स्थल है जो वर्तमान में पाकिस्तान के मोटगोमरी जिले में रावी नदी के किनारे स्थित है। हड़प्पा का उत्खनन 1921 में दयाराम साहनी और माधव स्वरूप वत्स ने किया।

सिंधु सभ्यता के अधिकांश स्थल सिंधु नदी के किनारे पाए गए हैं इसी कारण इस सभ्यता को सिंधु सभ्यता के नाम से जाना जाता है। सिंधु सभ्यता के स्थलों में सर्वप्रथम  हड़प्पा नामक स्थल का उत्खनन हुआ है जो रावी नदी के किनारे मिलाअतः  सिंधु सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है।

सिंधु सभ्यता की  समयावधि 2400 ई.पू. से 1700 ई. पूर्व. तक माना जाता है।

सिंधु सभ्यता की खोज दयाराम साहनी ने की। सिंधु सभ्यता को एक नगरीय सभ्यता माना जाता है। इसके विपरीत वैदिक सभ्यता एक ग्रामीण सभ्यता थी। सिंधु सभ्यता को प्रागैतिहासिक काल में रखा जाता है। सैंधव सभ्यता की लिपि को अब तक पढ़ा नहीं जा सका है। सैंधव सभ्यता के मुख्य निवासी द्रविड़ एवं भूमध्यसागरीय थे।

सिंधु सभ्यता का सबसे पश्चिमी स्थल सूत्कागेंडोर बलूचिस्तान में दाश्क नदी के किनारे स्थित है। पूर्वी स्थल मेरठ जिले के आलमगीरपुर नामक स्थान पर हिंडन नदी के किनारे स्थित है। सिंधु सभ्यता का सबसे उत्तरी स्थल चिनाब नदी के तट पर जम्मू कश्मीर में स्थित मांदा नामक स्थान है। दक्षिणी स्थल महाराष्ट्र के अहमदनगर में गोदावरी नदी के तट पर स्थित दाइमाबाद है।

 

 

चंदूहड़ो का खनन गोपाल मजूमदार ने 1931 ईस्वी में करवाया। चंदूहड़ो सैंधव सभ्यता का एक स्थल है जो पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिंधु नदी के किनारे स्थित है।

कालीबंगन का खनन 1953 में बी.बी. लाल एवं वी.के. थापर ने करवाया। कालीबंगन हड़प्पा सभ्यता का एक स्थल है जो राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के किनारे स्थित है।

कोटदीजी का खनन 1953 में फजल अहमद ने करवाया। यह स्थल भी सिंधु नदी के किनारे स्थित है।
रंगपुर का खनन रंगनाथ राव ने 1953-54 में करवाया। रंगपुर हड़प्पा सभ्यता का एक स्थल है जो गुजरात के काठियावाड़ में मादर नदी के किनारे स्थित है।
रोपड़ का खनन यज्ञदत्त शर्मा ने 1953-56 में करवाया। रोपड़ सिंधु सभ्यता का एक स्थल है जो वर्तमान में पंजाब के रोपड़ जिले में सतलज नदी के किनारे स्थित है।

लोथल का खनन 1955 तथा 1962 में रंगनाथ राव ने करवाया। लोथल गुजरात के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के किनारे स्थित है।लोथल को हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख बंदरगाह माना जाता है।

आलमगीरपुर का खनन 1958 यज्ञदत्त शर्मा ने करवाया। आलमगीरपुर हड़प्पा सभ्यता का एक स्थल है जो मेरठ जिले में हिंडन नदी के किनारे स्थित है।

सुत्कागेन्डोर का खनन आरेज स्टाइल तथा जार्ज डेल्स ने 1927 में करवाया। 1962 में इस स्थल का पुनः उत्खनन हुआ। यह स्थल पाकिस्तान में दाश्क नदी के किनारे स्थित है।
हड़प्पा सभ्यता के स्थल वनमाली का खनन 1974 में रविंद्र सिंह बिष्ट ने करवाया। यह स्थल हरियाणा के हिसार जिले में रंगोई नदी के किनारे स्थित है।

धौलावीरा का खनन रविंद्र सिंह बिष्ट ने 1990 में करवाया। धौलावीरा गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है।

सिंधु सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी।सिंधु सभ्यता के लोगों ने नगर तथा घर बनाने के लिए ग्रीड पद्धति अपनाई थी। घरों की खिड़कियां और दरवाजे सामने की ओर ना खुलकर पीछे की ओर खुलते थे।इतिहासकारों का मानना है कि केवल लोथल में घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर प्रतीत होते हैं। मोहनजोदड़ो में एक वृहत स्नानागार मिला है। मोहनजोदड़ो में प्राप्त स्नानागार को सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा इमारत माना जाता है। सिंधु घाटी के नगरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं।

कालीबंगा में जूते हुए खेत और नक्काशीदार ईंटों के प्रयोग का प्रमाण मिलता है। सिंधु सभ्यता के लोगों की प्रमुख फसल गेहूं और जौ थे तथा वे शहद का भी प्रयोग करते थे। लोथल एवं रंगपुर में चावल के दाने मिलें हैं जिससे इतिहासकार धान की खेती का अनुमान लगाते हैं। सिंधु सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानकर उसकी आराधना करते थे। सिंधु वासी यातायात के लिए बैलगाड़ी का प्रयोग करते थे। कालीबंगा और लोथल से सैंधवकालीन घोड़े के अस्थिपंजर मिले हैं।

सिंधु सभ्यता की लिपि चित्रात्मक है यह दाएं से बाएं ओर की तरफ लिखी जाती है। इतिहासकारों का मानना है कि स्वास्तिक चिन्ह हड़प्पा सभ्यता की ही देन है। स्वास्तिक चिन्ह से सूर्य उपासना का अनुमान लगाया जाता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि मेसोपोटामिया के अभिलेखों में प्राप्त मेलूहा शब्द का प्रयोग सिंधु सभ्यता के लिए किया गया है।

माना जाता है कि हड़प्पा सभ्यता का शासन व्यापारी वर्ग के हाथों में था। मनोरंजन के लिए सिंधु सभ्यता के लोग मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु पक्षियों को आपस में लड़ाना तथा पाशा खेलना आदि का प्रयोग करते थे। वृक्ष पूजा के प्रचलन का साक्ष्य भी सिंधु सभ्यता में मिलता है। सिंधु सभ्यता के लोग सूती एवं उनी वस्त्रों का प्रयोग करते थे तथा वे तलवार से परिचित नहीं थे।

सिंधु सभ्यता में शवों को गाड़ने और जलाने दोनों की प्रथाएं प्रचलित थी। विद्वानों का मत है कि हड़प्पा में शवों को दफनाया जाता था जबकि मोहनजोदड़ो में शवों को जलाने की प्रथा थी।

सिंधु सभ्यता का विनाश किस प्रकार हुआ इस विषय पर विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वानों का मानना है कि बाहरी आक्रमण के कारण सिंधु सभ्यता नष्ट हुई होगी। अकाल, बाढ़ और भूकंप आदि सिंधु सभ्यता के नष्ट होने के कारणों में गिना जाता है। सिंधु सभ्यता के नष्ट होने में सबसे प्रभावशाली कारण बाढ़ को माना जाता है।

 

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