मोपला विद्रोह कब हुआ था ?

 

मोपला विद्रोह 1921-22 में हुआ था जिसे वर्ग संघर्ष के रूप में देखा जाता है लेकिन घटनाएं बताती हैं कि इसकी प्रकृति सांप्रदायिक थी। मोपला केरल के मालाबार इलाके में रहने वाले मलयाली मुस्लिम थे. इस समुदाय के ज्यादातर लोग छोटे किसान और व्यापारी थे जो अपनी गरीबी और अशिक्षा के कारण थंगल कहे जाने वाले काजियों और मौलवियों के प्रभाव में थे। जबकि मालाबार इलाके की जमीनों और बड़े व्यापारों पर नंबूदरी एवं नायर उच्च वर्ग के हिंदुओं का कब्जा था. मोपला मुसलमान इनके यहां बटाईदार या काश्तकार के तौर पर काम किया करते थे.

मोपला आंदोलन के मुख्य नेता के रूप में ‘अली मुसलियार’ चर्चित है। महात्मा गांधी, शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेताओं का समर्थन इस आंदोलन को प्राप्त था। 15 फरवरी 1921 को सरकार ने निषेधाज्ञा लागू कर खिलाफत तथा कांग्रेस के नेताओं याकूब हसन, यू गोपाल मेनन, पी.मोइद्दीन कोया और के माधवन नायर को गिरफ्तार कर लिया। मोपला विद्रोह के पृष्ठभूमि में खिलाफत आंदोलन था। मोपला  विद्रोह को खिलाफत आंदोलन की असफलता का परिणाम कहा जा सकता है।

सन्यासी विद्रोह (1770-1800)

18 अगस्त 1920 को महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन के नेता शौकत अली के साथ मालाबार में कालीकट का दौरा किया जहां उन्होंने उपस्थित 20000 लोगों से असहयोग आंदोलन का समर्थन करने का आह्वान किया।उन्होंने यह भी कहा कि अंग्रेजों ने सात करोड़ मुसलमानों के धार्मिक भावनाओं को आहत करने का काम किया है।

मालाबार 1792 में ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आया। तब तक मोपला जो कि कभी संपन्न व्यापारिक समुदाय था दरिद्र बन चुका था क्योंकि अंग्रेजों और पुर्तगालियों ने समुद्री व्यापार का अधिकार छीन लिया था। उस समय अंग्रेजों के शासन के अंतर्गत मालाबार के अधिकतर जमींदार हिंदू थे। 19वीं शताब्दी के दौरान मोपला अधिकतर हिंदू जमींदारों और यूरोपियन नौकरशाहों पर हमला करते रहते थे। 1836 से 1919 के बीच 28 ऐसे विद्रोह हुए थे।अंग्रेजो के बीच भी यह चर्चाएं चलती रहती थी कि यह विद्रोह मालाबार के दमनात्मक भू व्यवस्था के विरुद्ध था या मोपलाओं के धार्मिक उन्माद की एक उपज थी।

19वीं शताब्दी में इस आंदोलन की बारंबारता भले ही ज्यादा रही हो लेकिन उसकी उग्रता कम थी जिसे बड़े आसानी से औपनिवेशिक शासन द्वारा कुचल दिया गया। लेकिन 1921 में इसने भयानक रूप धारण कर लिया। माना जाता है कि खिलाफत आंदोलन के कारण विश्वव्यापी इस्लामिक आह्वान के कारण यह संभव हुआ।

जैसे-जैसे मोपला विद्रोह अधिक आक्रामक होता गया यह अफवाह फैलने लगी कि ब्रिटिश शासन समाप्त होने वाला है और औपनिवेशिक सरकार ने इस विद्रोह के नेताओं को गिरफ्तार करने के लिए कदम उठाया। अगस्त 1921 में एक व्यापक अफवाह फैली कि सेना के गोरखा रेजीमेंट और पुलिस ने थीरूरंगड़ी के एक प्रमुख मस्जिद पर धावा बोल दिया है। क्रोधित भीड़ सुरक्षाबलों पर टूट पड़ी जिसमें 9 मुस्लिम और दो ब्रिटिश अधिकारियों की मौत हो गई।

संथाल विद्रोह (1855-56)-

विद्रोह के फैलते ही औपनिवेशिक शासन व्यवस्था के संकेतों टेलीग्राफ लाइन, ट्रेन स्टेशन, कचहरी, डाकखाने आदि पर हमले किए गए और उन्हें नष्ट कर दिया गया। जमींदारों के घरों पर भी हमले किए गए।अगस्त के अंत तक दक्षिण मालाबार का अधिकांश हिस्सा विद्रोहियों के कब्जे में था। प्रारंभ में केवल हिंदू जमींदारों पर हमले किए गए लेकिन बाद में सामान्य अन्य हिंदुओं पर भी हमले प्रारंभ हो गए तथा उन्हें जबरदस्ती इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया। अंग्रेजों के खिलाफ शुरू हुआ मोपला विद्रोह ने बाद में सांप्रदायिक रंग ले लिया। कहा जाता है कि विद्रोह के दौरान मालाबार इलाके के मोपला मुसलमानों ने हजारों हिंदुओं की हत्या कर दी थी। हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार हुए। हजारों हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कर उन्हें मुसलमान बना दिया गया।

मोपलाओं का यह विद्रोह क्षणिक था। जनवरी 1922 तक सरकार ने अपने सभी क्षेत्र विद्रोहियों से वापस ले लिए थे तथा उनके प्रमुख नेताओं को पकड़ लिया गया था। लगभग पच्चीस सौ विद्रोही मारे गए। 9 नवंबर 1921 को 100 मोपला विद्रोहियों को ट्रेन के जरिए मालाबार से कोयंबटूर भेजा जा रहा था जो वर्तमान तमिलनाडु राज्य में स्थित है। उन्हें सामान ढोने वाली बोगी में बंद रखा गया था। पांच घंटे के बाद जब उनके दरवाजे खोले गए तो सबको मृत पाया गया।

सितंबर 1921 में कांग्रेस कार्यकारी समिति द्वारा एक प्रस्ताव पास किया गया जिसमें मालाबार के कुछ क्षेत्रों में मोपलाओं द्वारा किए गए हिंसा पर गहरा खेद व्यक्त किया गया लेकिन दमन आत्मक कार्य के लिए ब्रिटिश शासन की भी आलोचना की गई।

गांधी ने इस विद्रोह के बारे में व्यापक रूप से लिखा। 8 सितंबर 1921 को उन्होंने मोपलाओं को अहिंसक ना रहने के लिए उनकी आलोचना की लेकिन प्रत्यक्ष रूप से सांप्रदायिक दंगों के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया। 20 अक्टूबर को उन्होंने जबरन धर्मांतरण के विषय को उठाया और अप्रत्यक्ष रूप से विद्रोहियों की आलोचना की:

“मुसलमानों को जबरन धर्मांतरण और लूटपाट जैसे अपने इस कृत्य के लिए स्वभाविक रुप से शर्म और पश्चाताप महसूस होना चाहिए और आगे उन्हें इतनी शालीनता से कार्य करना चाहिए कि आगे ऐसे कट्टर लोग उनके बीच उत्पन्न ना हो।”

विद्रोहियों के खिलाफ कठोर रवैया न अपनाने के कारण महात्मा गांधी को अन्य नेताओं के क्रोध का सामना करना पड़ा जिसमें भीमराव अंबेडकर भी थे जिन्हें लगता था कि महात्मा गांधी द्वारा खिलाफत आंदोलन का समर्थन मुस्लिम सहयोग प्राप्त करने के लिए किया गया। अंबेडकर के अनुसार महात्मा गांधी को लगता था कि मुसलमानों के सहयोग के बिना कांग्रेस भारत में एक शक्तिशाली संगठन नहीं बन सकता। अतः कई बार वे मुसलमानों के ऐसे अक्षम्य कारनामों की उपेक्षा करते रहते थे। डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ (1940) में लिखा, ‘सच्चाई यह है कि असहयोग आंदोलन का उद्गम खिलाफत आंदोलन से हुआ, उसका स्वराज्य के लिए आंदोलन से कुछ लेना-देना नहीं था। खिलाफतवादियों ने तुर्की की सहायता के लिए इसे शुरू किया और कांग्रेस ने उसे खिलाफतवादियों की सहायता के लिए अपनाया। उसका मूल उद्देश्य स्वराज्य नहीं, बल्कि खिलाफत था और उसे स्वराज्य का गौण उद्देश्य बनाकर उससे बाद में जोड़ दिया गया था, ताकि हिंदू भी उसमें भाग लें।’ हिंदुओं को इस आंदोलन से जोड़ने के लिए महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन को ‘मुसलमानों की गाय’ कहा था।

केरल के मालाबार इलाके में हुआ मोपला विद्रोह खिलाफत आंदोलन के साथ भड़का था।प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की की हार के बाद अंग्रेजों ने वहां के खलीफा को गद्दी से हटा दिया था। अंग्रेजों की इस कार्रवाई से दुनियाभर के मुसलमान नाराज हो गए। तुर्की के सुल्तान की गद्दी वापस दिलाने के लिए ही खिलाफत आंदोलन की शुरुआत हुई।

खिलाफत आंदोलन का लक्ष्य तुर्की के सुलतान की गद्दी वापस दिलाना था। इस आंदोलन को महात्मा गांधी का समर्थन प्राप्त था। गांधी ने असहयोग आंदोलन को खिलाफत आंदोलन से जोड़ने पर बल दिया। उनका तर्क था कि असहयोग को खिलाफ़त के साथ मिलाने से भारत के दो प्रमुख समुदाय हिन्दू और मुसलमान मिलकर अंग्रेजी शासन का अंत कर देंगे। किंतु गांधी जी की यह आशा मूर्त रूप नहीं ले सकी। महात्मा गांधी जब भारत में खिलाफत आंदोलन चला रहे थे उसी समय तुर्की के लोग उसे खत्म करना चाहते थे। मुस्तफा कमाल पाशा ने 1924 में खलीफा के पद को समाप्त कर दिया।

वांडीवाश का युद्ध (1760)

 

खिलाफत आंदोलन की शुरुआत में आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ था। अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए हर हथकंडा अपनाया. इस आंदोलन के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जिसके बाद मालाबार इलाके में आंदोलन का नेतृत्व मोपला मुसलमानों के हाथों में चला गया। मोपलाओं के हाथ में जाने के बाद आंदोलन बिगड़ गया। मोपलाओं ने हिंदुओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया। उन्हें लगा कि हिंदुओं की उपेक्षा के कारण ही खिलाफत आंदोलन असफल रहा।

कहा जाता है कि मोपला विद्रोह के दौरान हजारों हिंदुओं का कत्लेआम हुआ और हजारों हिंदुओं को धर्म बदलने के लिए बाध्य होना पड़ा।इसके बाद जब आर्य समाज की ओर से शुद्धि आंदोलन चलाया गया तो जिन हिंदुओं को जबरन मुस्लिम बना दिया गया था, उन्हें वापस हिंदू धर्म में लाया गया। इस आंदोलन के दौरान ही इसके नेता स्वामी श्रद्धानंद को 23 दिसंबर 1926 को उनके ही आश्रम में गोली मार दी गई।

मोपला विद्रोह भारतीय औपनिवेशिक इतिहास की एक विवादास्पद घटना है। कुछ दक्षिणपंथी संगठनों का मानना है कि इसे अंग्रेजों के विरुद्ध एक आंदोलन मानकर इसका महिमामंडन बंद होना चाहिए क्योंकि यह आंदोलन नहीं बल्कि हिंदुओं के विरुद्ध दंगे थे।

 

 

 

 

 

 

 

 

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