नूरजहां कैसे बनी मुगल काल की सबसे ताकतवर महिला

नूरजहां मुगल काल की सबसे ताकतवर महिला थी जिसका अप्रत्यक्ष रूप से शासन पर पूरा नियंत्रण था।भारतीय मध्य काल के इतिहास में रजिया सुल्तान के बाद वह दूसरी ऐसी महिला थी।जहां रजिया सुल्तान ने प्रत्यक्ष रूप से 4 वर्षों तक शासन किया वहीं दूसरी तरफ जहांगीर के बादशाह होते हुए भी शासन पर पूर्ण नियंत्रण नूरजहां का रहा।

नूरजहां का वास्तविक नाम मेहरून्निसा था। वह जहांगीर की 20वीं तथा अंतिम पत्नी थी।उसका जन्म 31 मई 1577 को कंधार में हुआ था जो वर्तमान अफगानिस्तान में स्थित है।उसके पिता का नाम मिर्जा गयास बेग तथा माता का नाम अस्मत बेगम था। मिर्जा गयास बेग अकबर की सेना में ऊंचे पद पर आसीन था।नूरजहां की माता अस्मत बेगम को ही इत्र का खोज करने का श्रेय दिया जाता है।

मेहरुन्निसा का विवाह 17 वर्ष की अवस्था में ‘अलीकुली बेग’ नामक एक साहसी ईरानी नवयुवक से हुआ था, जिसे जहाँगीर ने शेर अफगान की उपाधि दी और वह बाद में मुगल काल के महत्वपूर्ण प्रांत बंगाल का गवर्नर बना। 1607 ई. में शेर अफगान की मृत्यु के बाद नूरजहां को दिल्ली लाया गया और उसे अकबर की विधवा रुकैयाबेगम के देखभाल के लिए लगा दिया गया। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि नूरजहां से विवाह करने के लिए जहांगीर ने स्वयं उसके पति की हत्या करवाई। जहाँगीर ने सर्वप्रथम नौरोज़ त्यौहार के अवसर पर हांा मेहरून्निसा को देखा और उसके सौन्दर्य पर मुग्ध हो गया। लेकिन अकबर के जिंदा रहते वह उसे प्राप्त ना कर सका। किंतुु इसका भी स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता क्योंकि शेर अफगान की मृत्यु के 4 साल बाद जहाँगीर ने मई, 1611 ई. में मेहरून्निसा से विवाह किया। विवाह के पश्चात् जहाँगीर ने उसे ‘नूरमहल’ एवं ‘नूरजहाँ’ की उपाधि प्रदान की। 1613 ई. में नूरजहाँ को ‘बादशाह बेगम’ बनाया गया। इसका अर्थ है कि बादशाह की वर्तमान जीवित सभी रानियों में सर्वप्रधान।

असाधारण सुन्दरी होने के अतिरिक्त नूरजहाँ बुद्धिमती, क्षमाशील और विवेकसम्पन्न भी थी। उसकी साहित्य, कविता और ललित कलाओं में विशेष रुचि थी। उसका लक्ष्य भेद अचूक होता था। 1619 ई. में उसने एक ही गोली से शेर को मार गिराया था। इन समस्त गुणों के कारण उसने अपने पति पर पूर्ण प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। इसके फलस्वरूप जहाँगीर के शासन का समस्त भार उसी पर आ पड़ा था। सिक्कों पर भी उसका नाम अंकित जाने लगा और वह महल में ही दरबार करने लगी। उसके पिता एत्मादुद्दोला और भाई आसफ़ ख़ाँ को मुग़ल दरबार में उच्च पद प्रदान किया गया था और उसकी भतीजी का विवाह, जो आगे चलकर मुमताज़ के नाम से प्रसिद्ध हुई, शाहजहाँ से हो गया। उसने अपने पहले पति से उत्पन्न अपनी पुत्री का विवाह जहाँगीर के सबसे छोटे पुत्र शहरयार से कर दिया क्योंकि उसकी जहाँगीर से कोई संतान नहीं थी, अत: वह शहरयार को ही जहाँगीर के उपरांत राज सिंहासन पर बैठाना चाहती थी। नूरजहाँ के ये सभी कार्य उसकी कूटनीति का ही एक हिस्सा थे।

1620 ई. के अन्त तक नूरजहाँ के सम्बन्ध ख़ुर्रम (शाहजहाँ) से अच्छे नहीं रहे, क्योंकि नूरजहाँ को अब तक यह अहसास हो गया था कि शाहजहाँ के बादशह बनने पर उसका प्रभाव शासन के कार्यों पर कम हो जायगा। इसलिए नूरजहाँ ने जहाँगीर के दूसरे पुत्र ‘शहरयार’ को महत्व देना प्रारम्भ कर किया। चूंकि शहरयार अल्पायु एवं दुर्बल चरित्र का था, इसलिए उसके सम्राट बनने पर नूरजहाँ का प्रभाव पहले की तरह शासन के कार्यों में बना रहता। इस कारण से शेर अफ़ग़ान से उत्पन्न अपनी पुत्री ‘लाडली बेगम’ की शादी 1620 ई. में शहरयार से कर उसे 8000/4000 का मनसब प्रदान किया।

शाहजहाँ को जब इस बात का अहसास हुआ कि नूरजहाँ उसके प्रभाव को कम करना चाह रही है, तो उसने जहाँगीर द्वारा कंधार दुर्ग पर आक्रमण कर उसे जीतने के आदेश की अवहेलना करते हुए 1623 ई. में ख़ुसरो ख़ाँ का वध कर दक्कन में विद्रोह कर दिया। उसके विद्रोह को दबाने के लिए नूरजहाँ ने आसफ़ ख़ाँ को न भेज कर महावत ख़ाँ को शहज़ादा परवेज़ के नेतृत्व में भेजा। उन दोनों ने सफलतापूर्वक शाहजहाँ के विद्रोह को कुचल दिया। शाहजहाँ ने पिता जहाँगीर के समक्ष आत्समर्पण कर दिया और उसे क्षमा मिल गई। जमानत के रूप में शाहजहाँ के दो पुत्रों दारा शिकोह और औरंगज़ेब को बंधक के रूप में राजदरबार में रखा गया। 1625 ई. तक शाहजहाँ का विद्रोह पूर्णतः शान्त हो गया।

शाहजहाँ के विद्रोह को दबाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने वाले महावत ख़ाँ से नूरजहाँ को ईर्ष्या होने लगी। नूरजहाँ को इसका अहसास था, कि महावत ख़ाँ उन लोगों में से है, जिन्हें शासन के कार्यों में मेरा प्रभुत्व स्वीकार नहीं है। महावत ख़ाँ एवं शाहज़ादा परवेज की निकटता से भी नूरजहाँ को ख़तरा था। अतः उसके प्रभाव को कम करने के लिए नूरजहाँ ने उसे बंगाल जाने एवं युद्ध के समय लूटे गये धन का हिसाब देने को कहा। इन कारणों के अतिरिक्त कुछ और कारण भी थे, जिससे अपमानित महसूस कर महावत ख़ाँ ने विद्रोह कर काबुल जा रहे सम्राट जहाँगीर को झेलम नदी के तट पर 1626 ई. में क़ैद कर लिया। नूरजहाँ एवं उसके भाई आसफ़ ख़ाँ को भी बन्दी बना लिया। क़ैद में रखने पर भी महावत ख़ाँ ने जहाँगीर के प्रति निष्ठा एवं सम्मान की बात नहीं सोची। रोहतास में नूरजहाँ एवं जहाँगीर ने कूटनीति के द्वारा अपने को महावत ख़ाँ के प्रभाव से मुक्त कर लिया। महावत ख़ाँ अपनी सुरक्षा के लिए ‘थट्टा’ की ओर भाग गया। 28 अक्टूबर, 1626 को परवेज की मृत्यु के बाद एक तरह से महावत ख़ाँ कमज़ोर हो गया और वह शाहजहाँ की सेवा में चला गया।

इतिहासकारों का मानना है कि जहांगीर नशे काआदी था और बाद में उसके लिए राज-काज पर ध्यान देना मुश्किल हो गया था। इसलिए उसने अपने साम्राज्य की कमान नूरजहां के हाथों में सौंप दी थी। हालांकि ये पूरी तरह सच नहीं है। हां, जहांगीर नशे का आदी था और वो अफ़ीम लेता था। हां, वो नूरजहां से बहुत प्यार भी करता था. लेकिन नूरजहां के सत्ता संभालने की वजह ये नहीं थी.

नूरजहां और जहांगीर एक दूसरे के पूरक थे. जहांगीर अपनी पत्नी की तरक्की और बढ़ते प्रभाव से कभी असहज नहीं हुए.जहांगीर से शादी के कुछ ही वक़्त बाद नूरजहां ने अपना पहला शाही फ़रमान ज़ारी किया था जिसमें कर्मचारियों के ज़मीन की सुरक्षा की बात कही गई थी. इस फ़रमान के उनके दस्तख़त थे- नूरजहां बादशाह बेगम. इससे पता चलता है कि नूरजहां की ताक़त कैसे बढ़ रही थी.

हाँगीर के जीवन काल में नूरजहाँ सर्वशक्ति सम्पन्न रही, किंतु 1627 ई. में जहाँगीर की मृत्यु के उपरांत उसकी राजनीतिक प्रभुता नष्ट हो गई। नूरजहाँ की मृत्यु 1645 ई. में हुई। अपनी मृत्यु पर्यन्त तक का शेष जीवन उसने लाहौर में बिताया। उसकी कलात्मक रुचि का प्रमाण उस भव्य एवं आकर्षक मक़बरे में उपलब्ध है, जिसे उसने अपने पिता एत्मादुद्दोला के अस्थि अवशेषों पर आगरा में बनवाया था। कलाविदों के अनुसार यह मक़बरा बारीक और साज-सज्जा की दृष्टि से अनुपम है।

साल 1617 में चांदी के सिक्के जारी किए गए जिन पर जहांगीर के बगल में नूरजहां का नाम छपा था.अदालत के अभिलेखक, विदेशी राजनायिक, व्यापारी और मेहमानों ने भी नूरजहां के ख़ास दर्ज़े को पहचानना शुरू कर दिया.

अदालत के एक दरबारी ने एक घटना का वर्णन किया है जब नूरजहां ने उस शाही बरामदे में आकर सबको चौंका दिया जो सिर्फ़ पुरुषों के लिए आरक्षित था.

रूढ़िवादी परंपराओं के ख़िलाफ़ नूरजहां का ये एकमात्र प्रतिरोध नहीं था. फिर चाहे वो शिकार करना हो, शाही फ़रमान और सिक्के जारी करना हो, सार्वजनिक इमारतों का डिजाइन तैयार करना हो, ग़रीब औरतों की मदद के लिए नए फ़ैसले लेने हो या हाशिए पर पड़े लोगों की अगुवाई करनी हो, नूरजहां ने ये सब करके अपने वक़्त में एक असाधारण महिला की ज़िंदगी जी.

नूरजहां मुगल काल की पहली महिला थी जिसका नाम उस काल के सिक्कों पर अंकित है।जब राजा दरबार लगाते थे तो उस समय वह दरबार में उपस्थित रहती थी।राजा के अस्वस्थ रहने पर वह स्वतंत्र रूप से दरबार का संचालन करती थी।उसके पास राजशाही मुहर रहती थी जिसका तात्पर्य है कि किसी भी आदेश को देखने और उसे जारी करने का उसे पूरा अधिकार था। जहांगीर भी आदेश जारी करने से पहले उसकी सलाह लेता था। नूरजहां के बाद मुमताज महल दूसरी ऐसी मुगलकालीन महारानी थी जिसे अपने पति से इतना समर्पण प्राप्त था लेकिन उसकी रूचि राजकाज में नहीं थी।शाहजहां के इसी समर्पण का परिणाम था कि उसने मुमताज महल की याद में ताजमहल का निर्माण करवाया।


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