पाल वंश की राजधानी क्या थी?

पाल वंश की राजधानी मुंगेर थी जो वर्तमान में बिहार में स्थित है। तत्कालीन बंगाल में वर्तमान का बंगाल, उड़ीसा और बिहार के क्षेत्र सम्मिलित थे । कालांतर में पाल शासकों ने कामरूप (असम) को भी पाल साम्राज्य के अधीन कर लिया।

पाल वंश की स्थापना गोपाल ने  750 ई. में की थी।  पाल वंश का उदय भारत के पूर्वी क्षेत्र बंगाल में हुआ था जिसे पूर्वकाल में गौड़ नाम से भी जाना जाता था ।

भारत के अंतिम हिंदू सम्राट कहे जाने वाले हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद उत्तर भारत में 3 बड़े राज्यों का उदय हुआ।
भारत के पश्चिमी क्षेत्र में गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना हुई जिसका महत्वपूर्ण शासक नागभट्ट प्रथम हुआ जिसने अरबों का सफलतापूर्वक दमन किया और पश्चिमी भारत में एक शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की। गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना हरिश्चंद्र नामक राजा ने की थी।

इसी समय महाराष्ट्र में राष्ट्रकूट वंश का भी उदय हुआ जिसका प्रमुख शासक दंतीदुर्ग था। राष्ट्रकूटों ने उसी क्षेत्र पर अपना महल खड़ा किया जहां पहले सातवाहन और चालुक्य राज कर चुके थे।

तीसरा महत्वपूर्ण वंश था पाल वंश जिसकी स्थापना बंगाल में हुई थी। बंगाल को पूर्व काल में गौड़ देश के नाम से भी जाना जाता है।

हर्ष का समकालीन बंगाल का राजा शशांक था जिसकी मृत्यु के बाद बंगाल में अराजकता फैल गई। शशांक की मृत्यु के बाद लगभग एक शताब्दी तक बंगाल में अराजकता का माहौल रहा। इन 100 वर्षों में बंगाल में 3 राजाओं की हत्या भी हो चुकी थी। शक्तिशाली लोग अशक्त लोगों का का शोषण करते रहे जिसे तत्कालीन अभिलेखों में मत्स्यन्याय की संज्ञा दी गई है। जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है उसी प्रकार का वातावरण बंगाल में बना हुआ था।

इसी अव्यवस्था के बीच गोपाल बंगाल का शासक बना और उसने बंगाल में शांति स्थापित की। गोपाल के संबंध में यह कथा भी प्रचलित है कि बंगाल की अराजकता से तंग आकर वहां की जनता ने गोपाल को शासक बनाया था. पाल वंश का शासन तेरहवीं शताब्दी के आरंभ तक चला।

हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद उत्तर में जिन तीन राज्यों का उदय हुआ था उसमें पाल वंश ही सबसे अधिक समय तक सत्ता में बना रहा।

गोपाल ने भारत के पूर्वी भाग में एक विशाल साम्राज्य की नींव डाली। गोपाल ने राजा बनने के बाद बिहार बंगाल और उड़ीसा में फैली हुई अराजकता को समाप्त किया तथा राज्य को आर्थिक उन्नति की ओर अग्रसारित किया। पाल शासक हिंदू थे किंतु इन्होंने बौद्ध धर्म को भी पर्याप्त संरक्षण दिया।
गोपाल ने ओदंतपुरी (बिहार) में एक विश्वविद्यालय का निर्माण करवाया। गोपाल एक योग्य शासक सिद्ध हुआ जिसने 770 ई. तक शासन किया।

पाल वंश के प्रमुख शासकों में धर्मपाल, देवपाल, नारायणपाल, महिपाल तथा नयपाल आदि थे।

गोपाल के बाद उसका पुत्र धर्मपाल सिंहासन पर आसीन हुआ। धर्मपाल पाल वंश का प्रथम शासक था जिसने कन्नौज के त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया था।

कन्नौज की सत्ता को प्राप्त करने के लिए आयुध वंश के दो भाई चक्रायुध और इन्द्रायुध आपस में संघर्षरत थे। धर्मपाल ने इन्द्रायुध को हराकर चक्रायुध को कन्नौज की गद्दी पर आसीन किया। धर्मपाल के खालिमपुर अभिलेख से पता चलता है कि कन्नौज नरेश को धर्मपाल के संरक्षण के कारण ही सत्ता प्राप्त हुई थी।

नारायण पाल के 17वें वर्ष के अभिलेख में भी धर्मपाल द्वारा चक्रायुध के राज्यारोहण का उल्लेख है।

खालिमपुर अभिलेख से ही पता चलता है कि कुरु, यदु, गंधार, भोज, मत्स्य एवं मद्र के राजाओं ने चक्रायुद्ध को कन्नौज का राजा स्वीकार कर लिया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय धर्मपाल का प्रभुत्व लगभग संपूर्ण उत्तर भारत में फैल चुका था।

चक्रायुद्ध को राजा बनाने के बाद धर्मपाल ने उत्तरापथस्वामी की उपाधि धारण की थी जिसका उल्लेख 11वीं शताब्दी के चंपू काव्य उदय सुंदरी कथा में भी मिलता है।

धर्मपाल भी बौद्ध धर्म का अनुयाई था जिसने अधिक मात्रा में मठ व बौद्ध विहार बनवाएं। धर्मपाल ने भागलपुर जिले में विक्रमशिला विश्वविद्यालय का निर्माण करवाया था तथा उसकी देखभाल के लिए 100 गांव दान में दिए थे। सोमपुर के प्रसिद्ध महाविहार का निर्माण भी धर्मपाल ने करवाया था।

धर्मपाल के बाद उसका पुत्र देव पाल गद्दी पर बैठा उसने भी अपने पिता के विस्तारवादी नीति का अनुसरण किया। उसने पूर्वोत्तर में पाल साम्राज्य का विस्तार किया। धर्मपाल के समय में ही अरबी यात्री सुलेमान भारत आया था। उसने जावा के शैलेंद्र वंशी शासक बाल पुत्रदेव के आग्रह पर नालंदा में एक बौद्ध विहार बनवाने के लिए 5 गांव दान में दिए थे। धर्मपाल ने ओदंतपुरी (बिहार) के प्रसिद्ध बौद्ध मठ का निर्माण करवाया था

देवपाल ने 850 ईसवी तक शासन किया था। देवपाल के निधन के बाद पाल वंश दुर्बल होने लगा था।

महिपाल (प्रथम) ने 988 से 1038 ईसवी तक शासन किया महिपाल को पाल वंश का द्वितीय संस्थापक भी कहा जाता है। देवपाल के बाद कमजोर हो रहे पाल वंश को महिपाल प्रथम में सुदृढ़ किया था।

पाल वंश का अंतिम शासक गोविंद पाल था जिसने 1174 तक शासन किया  जिसके बाद बंगाल में सेन वंश का उदय हुआ।

पाल वंश के शासकों में धर्मपाल देवपाल, विग्रहपाल तथा नारायण पाल ने कन्नौज के त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया था।

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