पल्लव वंश का संस्थापक कौन था?

पल्लव वंश का संस्थापक(Founder of pallava dynasty) सिंहविष्णु था। सिंहविष्णु का शासनकाल 575- 600 ई. तक था। पल्लव वंश दक्षिण भारत का एक प्रमुख राजवंश था। पल्लव शासकों की राजधानी कांचीपुरम(तमिलनाडु) थी।

किरातार्जुनीयम् के लेखक भारवि पल्लव शासक सिंहविष्णु के दरबारी कवि थे। दसकुमारचरित की रचना दंडी ने की जो नरसिंह वर्मन द्वितीय के दरबारी कवि थे। वातपीकोंड की उपाधि नरसिंह वर्मन प्रथम ने धारण की थी।

राष्ट्रकूट वंश का संस्थापक दंतिदुर्ग था। दंतीदुर्ग ने राष्ट्रकूट वंश की स्थापना 752 ई. में की थी। राष्ट्रकूट राजवंश की राजधानी मान्यखेत थी।एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ने करवाया था।

कन्नौज पर अधिकार करने के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेने वाला प्रथम राष्ट्रकूट शासक ध्रुव था जिसने प्रतिहार नरेश वत्स राज्यपाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया था। ध्रुव को धारा वर्ष भी कहा जाता है। राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय ने त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेकर चक्रायुद्ध युद्ध एवं उसके संरक्षक धर्मपाल तथा प्रतिहार वंश के शासक नागभट्ट द्वितीय को हराया था।

कुषाण वंश का संस्थापक(Founder of Kushan dynasty) कुजुल कडफिसेस था। कनिष्क कुषाण वंश का सबसे प्रतापी राजा था। कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर थी। पुरुषपुर का आधुनिक नाम पेशावर है। कुषाणों की दूसरी राजधानी मथुरा थी। कनिष्क 78 ई. में राजगद्दी पर बैठा। कनिष्क के समय में ही चतुर्थ बौद्ध संगीति कुंडल वन (कश्मीर) में हुई जिसका अध्यक्ष वसुमित्र था।

कनिष्क बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय का अनुयायी था। चरकसंहिता की रचना करने वाला चरक कनिष्क का राजवैद्य था। कनिष्क के राजकवि अश्वघोष ने बुद्धचरित की रचना की। बुद्धचरित को बौद्धों का रामायण कहा जाता है।

सापेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत करने वाले नागार्जुन कनिष्क के समकालीन थे। नागार्जुन को भारत का आइंस्टीन कहा जाता है। कनिष्क की मृत्यु 102 ई. में हो गयी। कुषाण वंश का अंतिम शासक वासुदेव था।

गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त था।
श्री गुप्त ने गुप्त वंश की स्थापना 240 ई. में की। श्री गुप्त 280 ई. तक राजा रहा। श्रीगुप्त के बाद घटोत्कच राजा बना। गुप्त वंश का प्रथम महान शासक चंद्रगुप्त प्रथम था। चंद्रगुप्त प्रथम ने  लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया तथा महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

चंद्रगुप्त प्रथम के बाद समुद्रगुप्त 335 ई. में राजा बना। समुद्रगुप्त ने आर्यावर्त के 9 शासकों और दक्षिणावर्त के 12 शासकों को पराजित किया।समुद्रगुप्त को अपने जीवन काल में कभी हार का सामना नहीं करना पड़ा इसी कारण उसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है। समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण ने प्रयाग प्रशस्ति का लेख उत्कीर्ण करवाया।

समुद्रगुप्त को संगीत प्रेमी माना जाता है। सिक्कों पर समुद्रगुप्त को वीणा वादन करते हुए पाया गया है। समुद्रगुप्त को कविराज भी कहा जाता है। समुद्रगुप्त ने विक्रमंक की उपाधि धारण की थी।
समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी चंद्रगुप्त द्वितीय हुआ जिसे विक्रमादित्य भी कहा जाता है।

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य 380 ईसवी में राजा बना। चंद्रगुप्त द्वितीय के समय ही प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री फाह्यान भारत आया था। गुप्तकालीन शासक कुमारगुप्त ने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। गुप्त काल में उज्जैन महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।

भारत में सर्वप्रथम किसी के सति होने का प्रमाण 510 ई. के भानुगुप्त के एरण अभिलेख में मिलता है जिसमें किसी भोजराज की पत्नी के सती होने का उल्लेख मिलता है। गुप्त काल में वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं के लिए गाणिका का शब्द का प्रयोग किया गया है। गुप्तकालीन शासक वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। कालिदास गुप्तकालीन साहित्यकार हैं।

वर्धन वंश का संस्थापक पुष्यभूति था। वर्धन शासकों की राजधानी थानेश्वर थी जो वर्तमान में हरियाणा में कुरुक्षेत्र के समीप है।

वर्धन वंश का प्रमुख शासक प्रभाकर वर्धन था। प्रभाकर वर्धन ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद 606 ई. में हर्षवर्धन थानेश्वर की राजगद्दी पर बैठा। हर्षवर्धन को शिलादित्य के नाम से भी जाना जाता है।हर्षवर्धन और पुलकेशिन द्वितीय के बीच नर्मदा नदी के तट पर हुआ जिसमें हर्षवर्धन की हार हुई और उसे पीछे हटना पड़ा।

हर्षवर्धन के समय में ही प्रति पांचवें वर्ष एक समारोह का आयोजन किया जाता था जिसे महामोक्ष परिषद कहा जाता था। हर्षवर्धन एक महादानी राजा था। बाणभट्ट हर्षवर्धन का दरबारी कवि था जिसने हर्षचरित एवं कादंबरी की रचना की थी।

हर्षवर्धन स्वयं एक उत्कृष्ट रचनाकार था जिसने प्रियदर्शिका, रत्नावली तथा नागानंद नामक तीन संस्कृत नाटकों की रचना की थी। हर्षवर्धन को भारत का अंतिम हिंदू सम्राट कहा जाता है।लेकिन वह कट्टर हिंदू नहीं था बल्कि सभी धर्मों का आदर करता था।

हर्षवर्धन के बाद भारत में कई छोटे-छोटे राज्यों का उदय हुआ तथा मुसलमानों के आक्रमण भी प्रारंभ हो गए थे। हर्षवर्धन की मृत्यु 647 ई. में हुई थी। हर्षवर्धन के समय मथुरा सूती वस्त्रों का केंद्र था।

 

कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना तैलप द्वितीय ने की थी। तैलप द्वितीय की राजधानी मान्य खेत थी। कल्याणी के चालुक्य वंश का सबसे प्रतापी शासक विक्रमादित्य षष्टम था। हिंदू विधि ग्रंथ मिताक्षरा की रचना विज्ञानेश्वर ने की थी। विक्रमांकदेवचरित की रचना विल्हण ने की थी।

चोल वंश का संस्थापक विजयालय थी। चोल वंश 9 वीं शताब्दी में पल्लवों के ध्वंसावशेषों पर स्थापित हुआ था। चोलों की राजधानी तंजाउर थी। चोल वंश के राजा राजराज प्रथम ने श्रीलंका पर आक्रमण किया था। चोल वंश का सर्वाधिक विस्तार राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में हुआ था। राजेंद्र प्रथम ने बंगाल के पाल शासक महिपाल को पराजित किया था

यादव वंश की स्थापना  भिल्लभ पंचम ने देवगिरी में की थी। देवगिरी महाराष्ट्र राज्य में स्थित है। सिंहण यादव वंश का सबसे प्रतापी राजा था। यादव वंश का अंतिम स्वतंत्र शासक रामचंद्र था जिसने अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था।

होयसल वंश का संस्थापक विष्णुवर्धन था। होयसल वंश की राजधानी द्वार समुद्र थी। होयसल वंश यादव वंश का एक शाखा था। होयसल वंश के शासक विष्णु वर्धन ने 1117 ई. में बेलूर में चेन्ना केशव मंदिर का निर्माण करवाया था। होयसल वंश का अंतिम शासक वीर बल्लाल तृतीय था जिसे अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने हराया था।

 

 

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