तराइन का द्वितीय युद्ध कब हुआ था

तराइन का द्वितीय युद्ध 1192 ई. में   मुहम्मद गौरी तथा पृथ्वीराज चौहान के बीच हुआ। तराइन के  द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार ने भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। इस युद्ध में पृथ्वीराज की हार राजपूतों के आपसी कलह का परिणाम था। तराइन की  द्वितीय  लड़ाई  की भूमिका के निर्माण में जयचंद तथा संयोगिता नामक दो पात्र विशेष है जो युद्ध को अनिवार्य बना देते हैं।

जयचंद कन्नौज का राजपूत शासक था जो पृथ्वीराज चौहान के यश और प्रसिद्धि से जलता था। जयचंद की एक पुत्री थी जिसका नाम था संयोगिता। अपने जादुई सुंदरता के कारण वह भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। कहां जाता है कि वह भी पृथ्वीराज से प्रेम करने लगी क्योंकि पृथ्वीराज के यश और साहस ने उसे भी प्रभावित कर दिया था। वह पृथ्वीराज से विवाह करना चाहती थी। दूसरी तरफ पृथ्वीराज को भी संयोगिता के विषय में पता चला और वह भी उससे प्रेम करने लगा।

तराइन का प्रथम युद्ध

दूसरी तरफ जब जयचंद को संयोगिता और पृथ्वीराज के इस प्रेम प्रसंग के बारे में पता चला तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने पृथ्वीराज को अपमानित करने की योजना बनाई। जयचंद ने अपनी पुत्री संयोगिता के स्वयंवर का आयोजन किया। चारों ओर से योग्य राजाओं और राजकुमारों को उस स्वयंवर में आमंत्रित किया गया लेकिन पृथ्वीराज को नहीं बुलाया गया।पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए जयचंद ने अपने दरबार के बाहर दरवाजे पर पृथ्वीराज चौहान की एक मिट्टी की मूर्ति बनवाई और उसे द्वारपाल के रूप में दर्शाया गया।

कहां जाता है कि इस स्वयंवर के समाचार का पता पृथ्वीराज को लग जाता है और वह संयोगिता को प्राप्त करने के लिए वहां पहुंच जाता है। संयोगिता अपने हाथ में वरमाला लेकर दरबार से होते हुए वह वरमाला किसी राजा के के गले में ना डालकर पृथ्वीराज के मूर्ति को पहना देती है। पृथ्वीराज उस मूर्ति के पीछे खड़ा था और वह तुरंत संयोगिता को घोड़े पर बैठता है और उसे लेकर वहां से भाग जाता है। जैसा कि हम जानते हैं जयचंद में अकेले पृथ्वीराज का सामना करने का साहस नहीं था अतः वह कुछ ना कर सका और क्रोध की अग्नि में जलने लगा।

दूसरी तरफ कई इतिहासकार इस कहानी को सत्य नहीं मानते हैं और उनका कहना है कि पृथ्वीराज ने संयोगिता का अपहरण किया था। चंदबरदाई पृथ्वीराज का दरबारी कवि था जिसके द्वारा रचित पुस्तक ‘पृथ्वीराज रासो’ में इस घटना का वर्णन है अतः उसकी बातों पर पूर्ण रुप से विश्वास नहीं किया जा सकता।

पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता का अपहरण करने की घटना से जयचंद बहुत आहत था वह बदले की आग में जल रहा था। लेकिन जैसा कि हम जानते हैं अकेले वह पृथ्वीराज का सामना नहीं कर सकता था इसलिए उसने मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया और उसको इस युद्ध में अपनी सहायता का वचन दिया। जयचंद को लगता था कि इस युद्ध में पृथ्वीराज की हार के बाद उसे दिल्ली मिल जाएगी। दूसरी तरफ मोहम्मद गौरी भी पृथ्वीराज से अपनी पराजय का बदला लेने के लिए बेचैन था। जयचंद द्वारा सैन्य सहायता देने की बात पर वह पृथ्वीराज से युद्ध करने के लिए तैयार हो गया। राजा जयचंद की आंखों पर प्रतिशोध का ऐसा पर्दा पड़ गया था कि वह एक तुर्क के साथ मिलकर अपने ही राजपूत भाइयों को मारने की योजना बनाने लगा।

दूसरी तरफ जब पृथ्वीराज को पता चला कि मोहम्मद गोरी ने दोबारा उससे युद्ध करने की योजना बनाई है तो वह तनिक भी विचलित नहीं हुआ। पुनः तराईन के मैदान में दोनों की सेनाएं 1192 में आमने-सामने खड़े थी। इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने कई और राजपूत राजाओं से सहायता मांगी लेकिन संभवतः संयोगिता का अपहरण करने के कारण राजपूतों ने उसकी सहायता करने से मना कर दिया। कहा जाता है कि इस युद्ध में पृथ्वीराज की ओर से 300000 सैनिकों ने भाग लिया और गौरी की ओर से लगभग 150000 सैनिक थे। गोरी के पास राजपूतों के मुकाबले अच्छा घुड़सवार दस्ता था। गोरी के घुड़सवार दस्ते ने पृथ्वीराज के हाथियों को चारों ओर से घेर कर उन पर बाणों की वर्षा शुरू कर दी। पृथ्वीराज के घायल हाथियों ने अपने ही सेना को कुचलना प्रारंभ कर दिया। तराइन के द्वितीय युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि इस युद्ध में एक राजपूत दूसरे राजपूत के प्राणों का प्यासा था। प्रतिशोध की आग में अंधे होकर भारत के राजपूत राजा आपस में मार काट कर रहे थे। अंततः इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार हुई और उसकी हत्या कर दी गई।

तराइन के  द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गोरी की जीत का कारण राजपूतों की आपसी कलह थी। इस युद्ध के बाद भारत में मुसलमानों का राज्य स्थापित हो गया। दिल्ली, कन्नौज, अजमेर और पंजाब पूर्ण रूप से गोरी के अधीन हो गए। मोहम्मद गोरी अपने सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को अपने जीते हुए इन प्रदेशों का गवर्नर बनाकर वापस चला गया। कुतुबुद्दीन ऐबक मोहम्मद गौरी का एक गुलाम था अतः उसने मोहम्मद गौरी की हत्या के बाद भारत में 1206 ई. में गुलाम वंश की स्थापना की और लाहौर को अपनी राजधानी बनाया।

तराइन का द्वितीय संघर्ष  संभवतः इतिहास का पहला ऐसा युद्ध है जो हमें आपसी शत्रुता के बारे में बहुत कुछ सिखाता है। जयचंद शब्द धोखेबाजो के लिए एक पर्याय बन गया। दिल्ली को प्राप्त करने का सपना देखने वाले जयचंद को कन्नौज भी गंवाना पड़ा। जिस बिच्छू को उसने पृथ्वीराज को मारने के लिए बुलाया उसी बिच्छू ने उसे भी डंक मारा। 1194 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक और जयचंद के बीच हुए चंदावर के युद्ध में जयचंद की हार हुई और उसकी हत्या कर दी गई। तराइन के  द्वितीय युद्ध का यह  परिणाम हुआ कि आगामी 700 वर्षों तक भारत में इस्लाम प्रभावी हो गया।

 

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