इसमें कोई आश्चर्य नहीं यदि कहा जाए कि यूपी बोर्ड के परीक्षा में नकल बंद होने से रोजगार में भी कुछ कमी आई है।

जब से उत्तर प्रदेश के बोर्ड एग्जाम में तीसरी आंख ने अपना पहरा डाला है लगता है परीक्षा की पूरी रौनक ही समाप्त हो चुकी है। पहले परीक्षा के दौरान दिन भर चलने वाले चाय, जलेबी, मिठाई,कचालू आदि अब दिखाई नहीं देते हैं। कई विद्यालयों में मुश्किल से चाय नसीब हो जाती है लेकिन अन्य पकवानों का तो दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिखता। नकल के दौर में छात्रों से वसूले गए पैसों से परीक्षा के दौरान विद्यालय भर में पार्टी का माहौल रहता था। इस स्थिति में परीक्षार्थी भी खुश रहते थे तथा शिक्षक भी प्रफुल्लित रहते थे। खाने पीने का दौर चलता रहता था। प्राइवेट विद्यालयों के अध्यापकों को जो कुछ अतिरिक्त मिल जाता था नकल बंद होने के कारण उस पर भी रोक लग गई।

सऊदी अरब और मुंबई से परीक्षाओं में बैठने के लिए आने वाले छात्र भी अब दिखाई नहीं दे रहे हैं।लगता है सरकार ने उन्हें भी विश्राम दे दिया है कि पढ़ना है तो पढ़ो नहीं तो कमाना है तो कमाओ दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते हैं।

 

नकल के दौर में हर साल विद्यालयों में वसूली गई रकम से कम से कम दो कक्षों का निर्माण हो जाता था। लेकिन इस समय लगता है सब पर विराम लग गया है। विद्यार्थियों की संख्या भी घट गई है। छात्र और शिक्षक दोनों सरकार को गाली देने में लगे हुए हैं।

परीक्षा के दौरान परीक्षार्थियों को भी पैसे देने में कोई समस्या महसूस नहीं होती थी कारण था कि एक बार विद्यालय में रजिस्ट्रेशन करवाओ साल भर गायब रहो और आकर परीक्षा दे दो पास हो जाओ। यूपी बोर्ड से संबंध अधिकांश विद्यालयों का यही हाल है। छात्र केवल कागज पर उपलब्ध हैं। उनकी असली उपस्थिति सऊदी अरब, कुवैत,अहमदाबाद, मुंबई, सूरत और लुधियाना में है।ऐसे छात्रों का यह भी मानना रहता है कि एक बार परीक्षा में बैठे तो पास हो ही जाएंगे।हालांकि अब 2 वर्षों से उनकी यह भ्रांति भी टूट रही है यही कारण है कि उनकी संख्या में काफी तेजी से गिरावट आ रहे हैं।

सरकार मूल्यांकन के समय थोड़ा नरम रवैया अपनाती है अन्यथा सफलता प्रतिशत 30 से ज्यादा ना जाता। पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे आजकल पब्लिक स्कूलों में शिफ्ट होते जा रहे हैं। हम लोगों से कहा जाता है कि ऐसे टीचर विद्यालय में पढ़ाते नहीं लेकिन जब बच्चे ही हमारे पास अच्छे नहीं हैं तो उसमें कितना सुधार लाया जाए।

यूपी बोर्ड के अधिकांश परीक्षार्थियों का हाल यह है कि उन्हें यह भी नहीं पता चल पाता कि उनकी परीक्षा कब है। परीक्षा सुबह रहती है और शाम के चक्कर में उसको छोड़ देते हैं।कई विद्यार्थियों को तो पता ही नहीं चलता है कि हमें कौन सी विषय की परीक्षा देनी है।परीक्षा में एक छात्रा सामान्य हिंदी के स्थान पर साहित्यिक हिंदी का प्रश्न पत्र हल करके घर चली आती है तब उसे पता चलता है कि उसने गलत प्रश्न पत्र को हल कर दिया। पढ़ेंगे एक अक्षर नहीं लेकिन परीक्षा देने के लिए बेचैन रहते हैं।

नकल रोकने की इस सुव्यवस्थित व्यवस्था के बावजूद कुछ ऐसे प्रधानाचार्य हैं जो अपने यहां की छात्राओं को नकल कराने के लिए हाथ-पांव मारते रहते हैं। उनको लगता है कि यदि उनके यहां की छात्राएं फेल हुई तो उनके यहां का प्रवेश संख्या घट जाएगा और विद्यालय खतरे में पड़ जाएगा।

नकल के दौर की कुछ बातें बड़े अच्छे से याद हैं जब विद्यालय द्वारा कुछ लड़के स्कूल के गेट पर तथा कुछ गेट से 100 मीटर आगे चौराहे पर यह देखने के लिए लगाए जाते थे कि कोई अधिकारी आ तो नहीं रहा है। जैसे ही विद्यालय की तरफ कोई चार पहिया मुड़ता था सब लोग सचेत हो जाते थे।उस समय छात्रों से अच्छी वसूली हो जाती थी इसलिए ऐसे कार्य करने के लिए विद्यालयों के साथ कुछ लड़के भी जुड़ जाते थे। यह वही लड़कें है जो चुनाव में भी पार्टियों के साथ जुड़े रहते हैं, इन्हें मौसमी रोजगार वाले लड़के कहना अधिक उचित होगा। बिना पकडा़ये अच्छे से नकल करवाने में यह लोग कुशल होते थे। अब इन बेचारों का भी मौसमी रोजगार चला गया।

ग्रामीण क्षेत्रों में हम देखते हैं कि अभिभावकों का ध्यान अपने बच्चों को पास कराने पर ज्यादा रहता है और पढ़ाने पर कम।विद्यालय की फीस जमा करने में उनकी नानी मरने लगती है लेकिन नकल के नाम पर वे बड़े आसानी से पैसे देने को तैयार रहते हैं।जब इन लोगों का बच्चा विद्यालय में लगातार अनुपस्थित रहता है और इन्हें सूचित किया जाता है तो यह स्वयं झूठ बोलते हैं कि बच्चा बीमार है। कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने बच्चों की पढ़ाई के विषय में सचेत नहीं है। कुछ ऐसे अभिभावक जो अपने बेटियों को केवल इसलिए हाईस्कूल, इंटर पास करवाना चाहते हैं ताकि उनके विवाह में थोड़ी आसानी मिल सके वे लोग भी इस व्यवस्था से रुष्ट होंगे।

नकल पर पूरी तरीके से लगाम लगने के बाद भी कुछ प्राइवेट विद्यालय हैं जो अपने यहां केंद्र बनवाने के लिए तत्पर रहते हैं।उन्हें लगता है कि कुछ समय बाद परिस्थितियां बदलेगी और उनके यहां फिर से पहले वाली हरियाली आ जाएगी और फिर उन दावतों का दौर प्रारंभ हो जाएगा।

एक तरफ जहां नकल बंद होने से प्राइवेट विद्यालयों में रोष है वहीं दूसरी ओर इस व्यवस्था से वे सरकारी अध्यापक खुश हैं जिनकी ड्यूटी परीक्षा केंद्रों पर लगाई जाती है। जब नकल का दौर चलता था तब ऐसे सरकारी अध्यापक भय में ड्यूटी करते थे उन्हें लगता था कि कभी कोई कार्यवाही हुई तो सबसे पहले वही पकड़े जाएंगे और प्राइवेट वालों के बारे में तो कहना ही क्या।

अब परीक्षाएं शांतिपूर्ण ढंग से चलती हैं उस भागम भाग की स्थिति नहीं रहती है जैसा कि पहले रहता था।उड़ाका दल के आने पर कुछ छात्र नकल की पर्चियां मुंह में रख लेते थे कुछ खिड़की से बाहर फेंक देते थे,अध्यापक जो स्वयं नकल कराता था वह पर्ची को अपनी जेब में रख लेता था,अध्यापकों की चेकिंग ना होने से वह बच जाता था। कुछ क्षण के लिए तो एकदम अफरा-तफरी मच जाती थी फिर भी नकल का दौर चलता रहता था।

कड़ाई से परीक्षा होने से भ्रष्ट अधिकारियों की अवैध की कमाई भी बंद हो गई।क्योंकि कहीं ना कहीं इन्हीं के सहयोग के कारण नकल का व्यवसाय बड़े धड़ल्ले से चलता था।कहीं ना कहीं मन ही मन में वे भी अपने इस कमाई के बंद होने के कारण सरकार को कोस रहे होंगे।पैसे लेकर भी परीक्षा केंद्र की अवैध गतिविधियों को नजरअंदाज कर देते थे।लेकिन आज वे भी पैसे के बदले नकल करवा पाने में असमर्थ है।

हमारे देश में कोई भी अच्छा या खराब कार्य हो और उस पर राजनीति न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता है। विशेषकर उस दौर में जबकि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर राजनीति कूट-कूट कर भरी चुकी हो। कुछ लोगों का कहना है कि बच्चे अपराधी नहीं हैं इसलिए इस प्रकार से कैमरे से उन पर नजर रखना उचित नहीं। कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि यह सब दिखावा है। तो आप क्या सोचते हैं अपनी टिप्पणियों के माध्यम से हमें अवश्य अवगत कराएं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *